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1 अक्टू॰ 2009

बाबूजी तुम हमें छोड़ कर…..!”

           पुनर्प्रकाशन के लिए क्षमा प्रार्थना सहित
मेरे सपने साथ ले गए
दुख के झंडे हाथ दे गए !
बाबूजी तुम हमें छोड़ कर
नाते-रिश्ते साथ ले गए...?
काका बाबा मामा ताऊ
सब दरबारी दूर हुए..!
बाद तुम्हारे मानस नाते
ख़ुद ही हमसे दूर हुए.

अब तो घर में मैं हूँ माँ हैं
और पड़ोस में विधवा काकी
रोज़ रात कटती है भय से
नींद अल्ल-सुबह ही आती.

क्यों तुम इतना खटते थे बाबा
क्यों दरबार लगाते थे
क्यों हर एक आने वाले को
अपना मीत बताते थे

सब के सब विदा कर तुमको
तेरहीं तक ही साथ रहे
अब हम दोनों माँ-बेटी के
संग केवल संताप रहे !

दुनिया दारी यही पिताश्री
सबके मतलब के अभिवादन
बाद आपके हम माँ-बेटी
कर लेगें छोटा अब आँगन !

18 जुल॰ 2008

ज़िंदगी

रोज़ स्याह रात कभी माहताब जिन्दगी
एक अरसे से मुसलसल बारात ज़िन्दगी
बाद मुद्दत के कोई दोस्त मिले
तबके उफने रुके ज़ज्बात ज़िन्दगी
तेरा बज्म...! मैं बेखबर तू बेखबर
एक ऐसी सुहागे रात ज़िन्दगी
बाद मरने के सब गुमसुम बेचैन दिखें
धुंए के बुत से मुलाक़ात ज़िन्दगी .

कितना असरदार

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