________________________शापित यक्ष ________________
दीवाली के पहले गरीबी से परेशान हमारे गांव में लंगड़,दीनू,मुन्ना,कल्लू,बिसराम और नौखे ने विचार किया इस बार लक्ष्मी माता को किसी न किसी तरह राजी कर लेंगें . सो बस सारे के सारे लोग माँ को मनाने हठ जोगियों की तरह रामपुर की भटरिया पे हो लिए जहां अक्सर वे जुआ-पत्ती खेलते रहते थे पास के कस्बे की चौकी पुलिस वाले आकर उनको पकड़ के दिवाली का नेग करते ये अलग बात है की इनके अलावा भी कई लोग संगठित रूप से जुआ-पत्ती की फड लगाते हैं..... अब आगे इस बात को जारी रखने से कोई लाभ नहीं आपको तो गांव में लंगड़,दीनू,मुन्ना,कल्लू,बिसराम और नौखे की कहानी सुनाना ज़्यादा ज़रूरी है.
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तो गांव में लंगड़,दीनू,मुन्ना,कल्लू,बिसराम - नौखे की बात की वज़नदारी को मान कर "रामपुर की भटरिया" के बीचौं बीच जहां प्रकृति ने ऐसी कटोरी नुमा आकृति बनाई है बाहरी अनजान समझ नहीं पाता कि "वहां छुपा जा सकता है. जी हां उसी स्थान पर ये लोग पूजा-पाठ की गरज से अपेक्षित एकांतवासे में चले गए ..हवन सामग्री उठाई तो लंगड़ के हाथौं से गलती से घी ज़मींन में गिर गया . बमुश्किल जुटाए संसाधन का बेकार गिरना सभी के क्रोध का कारण बन गया . कल्लू ने तो लंगड़ को एक हाथ रसीद भी कर दिया ज़मीं के नीचे घी रिसता हुआ उस जगह पहुंचा जहां एक शापित-यक्ष बंधा हुआ था .उसे शाप मिला था की सबसे गरीब व्यक्ति के हाथ से गिरे घी की बूंदें तुम पर गिरेंगीं तब तुम मुक्त होगे सो मित्रों यक्ष मुक्त हुआ मुक्ति दाता लंगड़ का आभार मानने उन तक पहुंचा . यक्ष को देखते ही सारे घबरा गए कल्लू की तो घिग्घी बंध गई. किन्तु जब यक्ष की दिव्य वाणी गूंजी "मित्रो,डरो मत, तो सब की जान में जान आई.
यक्ष:तुम सभी मुझे शाप मुक्त किया बोलो क्या चाहते हो...?
मुन्ना: हमें लक्ष्मी की कृपा चाहिए उसी की साधना में थे हम .
यक्ष: ठीक है तुम सभी चलो मेरे साथ
सभी मित्र यक्ष के अनुगामी हुए पीछे पीछे चल दिए पीपल के नीचे बैठ कर यक्ष ने कहा :-"मित्रो,मैं पृथ्वी भ्रमण पर निकला था तब मैनें अपनी शक्ति से तुम्हारे गांव के ज़मींदार सेठ गरीबदास की माता से गंधर्व विवाह किया था उसी से मेरा पुत्र जन्मा है जो आगे चल के सेठ गरीबदास के नाम से जाना जाता है."
यक्ष की कथा को बडे ही ध्यान से सुन रहे चारों मित्रों के मुंह से निकला :-"तो आप ही हमारे बडे ज़मींदार हैं ?"
"हां, मैं ही हूं, घर-गिरस्ति में फ़ंस कर मुझे वापस जाने का होश ही न रहा सो मुझे मेरे स्वामी ने पन्द्र्ह अगस्त उन्नीस सौ सैतालीस रात जब भारत आज़ाद हुआ था शाप देकर "रामपुर की भटरिया में कैद कर दिया था और कहा था जब गांव का सबसे गरीब आदमी घी तेल बहाएगा और उसके छींटै तुम पर गिरेंगे तब तुम को मुक्ति-मिलेगी.
आज़ तुम सबने मुझे मुक्त किया चलो.... बताओ क्या चाहते हो ?
सभी मित्रों ने काना-फ़ूसी कर "रोटी-कपडा-मकान" मांग लिए मुक्ति दाताओं के लिये यह करना यक्ष के लिए सहज था. सो उसने माया का प्रयोग कर गाँव के ज़मींदार के घर की लाकर तिजोरी बुला कर ही उन गरीबों में बाँट दी . जाओ सुनार को ये बेच कर रूपए बना लो बराबरी से हिस्सा बांटा कर लेना और हां तुम चारों के लिए मैं हर एक के जीवन में एक बार मदद के लिए आ सकता हूं.
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उधर गांव में कुहराम मचा था. सेठ गरीब दास गरीब हो गया. पुलिस वाले एक एक से पूछताछ कर रहे थे. इनकी बारी आये सभी मित्र बोले "हम तो मजूरी से लौटे हैं." किन्तु कोई नहीं माने झुल्ला-तपासी में मिले धन को देख कर सबको जेल भेजने की तैयारी की जाने . कि लंगड़ ने झट यक्ष को याद कर लिया . यक्ष एक कार में गुबार उडाता पहुंचा और पुलिस से रौबीली आवाज़ में बोला "इनको ये रूपए मैंने इनाम के बतौर दिए हैं."ये चोर नहीं हैं.
रहा सवाल सेठ गरीब दास का सो ये तो वास्तव में गरीब हैं
हवालदार ने कहा :-सिद्ध करोगे
यक्ष: अभी लो गाँव के सचिव से गरीबी रेखा की सूची मंगाई गई जिसमें सब से उपर सूची अनुसार सबसे ऊपर सेठ गरीब दास का नाम था
सूची में जो नाम नहीं थे वोलंगड़,दीनू,मुन्ना,कल्लू,बिसराम और नौखे के...?
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मयकदा पास हैं पर बंदिश हैं ही कुछ ऐसी ..... मयकश बादशा है और हम सब दिलजले हैं !!
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17 अक्टू॰ 2009
28 जून 2009
कहानी:"हाँ मुझे भी तुमसे इश्क है "
"१०१२ वीं पोस्ट एक प्रेम कहानी "संयोग ही था कि सुषमा के भावों को समझने में उसे बेहद देर लगी उससे भी ज़्यादा देर हुई संकेत समझ कर अनुवादन में. आज जब संस्कारों के पर्वत को पार कर नेह निमंत्रण देती आँखों में झांका तो एक तपस्वनी सी लग रही थी वो मुझे..? विपरीत परिस्थिति में मेरा साथ निभाती वो साँवली सलोनी मूरत अक्सर मेरी उदासी को अपनी उदासी मेरे उछाह को अपना उछाह समझती थी तब एक भी बार मन में इसका कारण मुझे न समझ आना और फिर अचानक ..............एक दिन जब मुझे लगा कि सुषमा मेरी नेह निमंत्रिका है तब तक समय का पाखी सथियों को अपने परों में लपेट कर इतनी दूर जा चुका था कि किसी भी सूरत में उससे उन स्थितियों को वापस लाना संभव न था.
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"सुषमा जी, आप चाहें तो इस काम को कल निपटाइए . "
"न सर, फिर हेड आफिस से कोई फरमान आ जाएगा तो फिर ..?"
"हाँ, ये तो है, पर अब देर भी तो ...?"
"कोई बात नहीं सर "
सुषमा ने सहजता से उस काम को अंतिम रूप दिया जो मेरे लिए एक उपलब्धि होने जा रहा था . अगले ही दिन हेड ऑफिस का फरमान आया कि दो घंटे में सर्वे रिपोर्ट तैयार हो जाए . तब जाकर लगा कि सुषमा आगे तक परफेक्ट सोच वाली है जिस काम के लिए अन्य मातहत टालमटोल कर रहे थे सुषमा ने समय के पूर्व ही निपटा दिया . बावजूद इसके मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सी बात मुझसे जोड़ रही थी उसे . जो हर पल सुषमा बेचैन रहती किसी न किसी बहाने मेरे इर्द गिर्द बने रहने के लिए
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बीमारी की वज़ह से तीन दिन की सी एल के आवेदन के साथ एक पेपर लगा था जिसमें कई सारे सरकारी अधूरे काम का ज़िक्र था . कैसे और कब तक किससे से कराना संभव होगा स्पष्ट रूप से लिखा था . पहला दिन तो यूं ही गुज़र गया किन्तु दूसरी सुबह बिना सुषमा के ऑफिस ऑफिस सा नहीं लग रहा था . चैम्बर का दरवाजा खुलता तो लगता सुषमा आ रहीं हैं . कई बार घंटी बजा कर प्यून बुलाया सुषमा को बुलाने को कहना चाहा फिर याद आते ही वापस भगा दिया .साथ-साथ रहते कोई बात समझ न आए वो बात तब आसानी से मन मीत के अभाव में ज़रूर समझ में आती है . आज एहसास हुआ कि सुषमा केवल कर्मचारी नहीं मेरे दिल की अधिकारी है.... जैसे तैसे लंच तक अपने आप को जप्त किया और बॉस को छुट्टी का मेल कर ऑफिस से निकला . घर गोया कहीं ज़्यादा वीरान लग रहा था क्या करुँ कहाँ जाऊं कुछ समझ में न आया फिर बदहवास सा घर से सीधे फ्लेट नंबर डी-22 में पहुँच गया जी सुषमा का यही घर कभी एक बार छोड़ने आया था और तीन बरस बाद आज आया .कई बार सोच विचार कर काल बेल न दबा सका. उलटे पाँव वापस जा रहा था कि नीचे सीडियों से पीली चेक साडी में लिपटी सुषमा ऊपर आती नज़र आयी . पास आते ही पूछ बैठी "सर,कोई ख़ास बात . ?"
मैं-"नहीं,वो मेरा मित्र प्रभात है न यहीं डी-21 में जो रहता है ! "
अरे सर बताया था न वो लोग नर्मदा रोड में चले गए सर आपका कार्ड भी तो था उनके गृह प्रवेश का याद कीजिए .
अपनी चोरी पकडी जान मन में अजीब सा अपराध बोध लिए ज़ल्द लौटना चाहता था .किन्तु सुषमा के आगृह ने गोया पाँव गस दिए . सुषमा के पीछे पीछे आज्ञाकारी सेवक सा हो लिया.
कालबेल बजाते ही सुषमा के पापा ने दरवाजा खोला . परिचय तो था ही सो बात चीत का सिलसिला पापा से चल निकला बातों बातों में मुझे बताया कि सुषमा को देखने कोई आने वाले हैं . सुन कर यूं लगा मानो किसी मज़बूत मकान को अर्रा के गिरते देख रहा हूँ ?
चाय-नास्ते के बाद वापस लौटते वक़्त मेरे उदास चेहरे को बांच उसने पूछा:"सर,उदास क्यों हैं ? कोई ख़ास वज़ह ?"
"हाँ,मैं कोई काम वक़्त पर नहीं करता जिससे मुझे कई बार नुकसान हुआ है "
सर, यदि ऑफिस का कोई प्राबलाम्ब हो तो मैं चलूँ ?
नहीं सुषमा, ज़िन्दगी का है तुम आने वालों का ध्यान रखो,
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ठीक तीसरे दिन , ऑफिस का नंबर सेल फोन पर ब्लिंक हुआ. दो बार मिस्ड होने के बाद तीसरी बार जब सुषमा का नंबर ब्लिंक हुआ तो उठाना लाज़मी था. अनमने ढंग से मेरा हेलो कहना उसे नागवारा गुज़रा. उसने मुझसे पूछा "ज़्यादा तबीयत खराब है ?"
"हाँ ?"
"सर, मैं आती हूँ "
ठीक पंद्रह मिनट बाद सुषमा फ्लेट में थी. मैंने कहा "क्यों कष्ट कर रहीं हैं आप ?"
"इसमें कष्ट क्या ............ आप वक्त पर काम नहीं करते आप मासूम भी हैं मुझे आपकी कमजोरी का ज्ञान है "
"क्या मतलब, मेरी तनाव ग्रस्त पेशानी पर हाथ रख सुषमा चहक उठी तीन दिन में ये हाल कर लिया ज़िन्दगी कैसे काटेंगे आप मेरे बगैर अनिमेष......?"
सर से अनिमेष संबोधन सुन मेरे मन में शांत पडा अभिव्यक्ति का ज्वालामुखी अचानक फूट पडा-" हाँ मुझे भी तुमसे इश्क है तुमसे ही पर अब क्या फायदा अब तो तुम यू एस ए जाओगी एन आर आई से ब्याह के !!"
"अनिमेष, तुम जैसी कमज़ोर नहीं हूँ मैंने उसे बता दिया था कि में अनिमेष से प्यार करतीं हूँ "
10 दिस॰ 2008
गुड्डू के बांके भैया
भैया
कहो दादा
जीत गए
हओ जीत गए
अपने गुड्डू के लानें
"सब हो जाएगा दादू अब निसफिकर रैना "
"काय, गुड्डू का बड़ा भाई भी मेई आऊं और मां भी बाप भी तुम चिंता नै करना "
###############################################कहो दादा
जीत गए
हओ जीत गए
अपने गुड्डू के लानें
"सब हो जाएगा दादू अब निसफिकर रैना "
"काय, गुड्डू का बड़ा भाई भी मेई आऊं और मां भी बाप भी तुम चिंता नै करना "
भैया , जा पंच बरसी सुई जीत लई....?
हओ,दादा
अपने गुड्डू को
अरे दादा, तुम काय चिंता कर रए हो, जा बार मैं मंत्री बन गओ तो गुड्डू
समझो.....?
"बूडा गोपाल हतप्रभ किंतु आशा भरी निगाहों से बांके लाल को देख रहा था
###############################################हओ,दादा
अपने गुड्डू को
अरे दादा, तुम काय चिंता कर रए हो, जा बार मैं मंत्री बन गओ तो गुड्डू
समझो.....?
"बूडा गोपाल हतप्रभ किंतु आशा भरी निगाहों से बांके लाल को देख रहा था
गुड्डू चुनावी झंडे बैनर ढोता, खम्बों पे लगाता , बांके भैया का परम सेवक पूरा दिन रात एक करता तीसरी बार भी यही सब कुछ करने जा रहा था कि सियासी जंग में घायल हो गया टांगें काटनी पड़ी . एक अपाहिज जिंदगी जो हर पल बांके की ओर आशा भरी नज़र से अपलक शून्य में तांक रहा था . बूडे बाप आंखों में अब उसे अपाहिज देखने की भी शक्ति न थी . फ़िर भी घसिटता हुआ बूदी बाखर की ओर चल पड़ा उसे पता जो चला था कि बांके भैया आए हैं .
लंबे इंतज़ार के बाद भईया जी के दर्शन पाकर आशा भरी निगाहों से उसे निहारता कि भैया जी ने कहा "दाऊ गुड्डू की मुझे चिंता अपन अपराधियों को सजा दिलवाएंगे जेल भेज देंगे अब तो हम मंत्री हो गए न "
सफ़ेद कार में सट से दाखिल भईया जी रवाना हुए . धूल का गुबार उडाता काफिला निकल पडा . दाऊ को अब कुछ नहीं दिख रहा था , दूर तलक
22 फ़र॰ 2008
तिरलोक सिंह की कहानी :
जबलपुर चौपाल: कामरेड त्रिलोक सिंह के बहाने से
एक व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है । उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था । कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पङता था । लगातार बक-बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए ,1 घंटे बोलने के लिए चार किताबें , चार दिन तक पढिए, 5 मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए, ये किसी प्रोफेसर ने बताया था याद नहीं शायद वे राम दयाल कोष्टा जी थे ,सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर , जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी, वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है। नाम चीन लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग वापस जबलपुर हुयी। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल,एक दो झोले किताबों से भरे , कैरियर में दबी कुछ पत्रिकाएँ , जेब में डायरी, अतरे दूसरे दिन आने लगे मलय जी के बेटे हिसाब बनवाने,आते या जाते समय मुझ से मिलना न भूलने वाले व्यक्तित्व ..... को मैंने एक बार बड़ी सूक्ष्मता से देखा तो पता चला दादा के दिल में भी उतने ही घाव हें जितने किसी युद्धरत सैनिक के शरीर,पे हुआ करतें हैं।
कर्मयोगी कृष्ण सा उनका व्यक्तित्व, मुझे मोहित करने में सदा हे सफल होता..... ठाकुर दादा,इरफान,मलय जी,अरुण पांडे,जगदीश जटिया,रमेश सैनी,के अलावा,ढेर सारे साहित्यकार के घर जाकर किताबें पढ़वाना तिरलोक जी का पेशा था। पैसे की फिक्र कभी नहीं की जिसने दिया उसे पढ़वाया , जिसके पास पैसा नहीं था या जिसने नही दिया उसे भी पढवाया । कामरेड की मास्को यात्रा , संस्कार धानी के साहित्यिक आरोह अवरोहों , संस्थाओं की जुड़्न-टूटन को खूब करीब से देख कर भी दादा ने इस के उसे नहीं कही। जो दादा के पसीने को पी गए उसे भी कामरेड ने कभी नहीं लताडा कभी मुझे ज़रूर फर्जी उन साहित्यकारों से कोफ्त हुई जिनने दादा का पैसा दबाया ।
कई बार कहा " दादा अमुक जी से बात करूं...?
रहने दो ...?
यानी गज़ब का धीरज ।
सूरज राय "सूरज" ने अपने ग़ज़ल संग्रह के विमोचन के लिए अपनी मान के अलावा मंच पे अगर किसी से आशीष पाया तो वो थे :"तिरलोक सिंह जी "। इधर मेरी सहचरी ने भी कर्मयोगी के पाँव पखार ही लिए। हुआ यूँ कि सुबह सवेरे दादा मुझसे मिलने आए किताब लेकर आंखों में दिखना कम हों गया था,फ़िर भी आए पैदल । सड़क को शौचालय बनाकर गंदगी फैलाने वाले का मल उनके सेंडिल में.... मेन गेट से सीढियों तक गंदगी के निशान छपाते ऊपर आ गए दादा. अपने आप को अपराधी ठहरा रहे थे जैसे कोई बच्चा गलती करके सामने खडा हो. इधर मेरा मन रो रहा था कि इतना अपनापन क्यों हो गया कि शरीर को कष्ट देकर आना पड़ा दादा को .संयुक्त परिवार के कुछ सदस्यों को आपत्ति हुयी की गंदगी से सना बूढा आदमी गंदगी परोस गया गेट से सीढी तक . सुलभा के मन में करूणा ने जोर मारा . उनके पैर धुलाने लगी . मानव धर्म के आधार में करुणा का महत्त्व सुलभा से बेहतर कौन समझ पाया होगा तब. . तिरलोक जी का आशीर्वाद लेकर सुलभा ने जाने कितना कुछ हासिल किया मुझे नहीं मालूम . मेरे और अन्य साहित्यकारों के बीच के सेतु तिरलोक जी फिर एकाध बार ही आए अब तो बस आतीं हैं उनकी यादें दस्तक देने मन के दरवाजे तक ऐसा सभी साथी महसूस करते हैं.
एक व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है । उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था । कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पङता था । लगातार बक-बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए ,1 घंटे बोलने के लिए चार किताबें , चार दिन तक पढिए, 5 मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए, ये किसी प्रोफेसर ने बताया था याद नहीं शायद वे राम दयाल कोष्टा जी थे ,सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर , जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी, वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है। नाम चीन लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग वापस जबलपुर हुयी। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल,एक दो झोले किताबों से भरे , कैरियर में दबी कुछ पत्रिकाएँ , जेब में डायरी, अतरे दूसरे दिन आने लगे मलय जी के बेटे हिसाब बनवाने,आते या जाते समय मुझ से मिलना न भूलने वाले व्यक्तित्व ..... को मैंने एक बार बड़ी सूक्ष्मता से देखा तो पता चला दादा के दिल में भी उतने ही घाव हें जितने किसी युद्धरत सैनिक के शरीर,पे हुआ करतें हैं।
कर्मयोगी कृष्ण सा उनका व्यक्तित्व, मुझे मोहित करने में सदा हे सफल होता..... ठाकुर दादा,इरफान,मलय जी,अरुण पांडे,जगदीश जटिया,रमेश सैनी,के अलावा,ढेर सारे साहित्यकार के घर जाकर किताबें पढ़वाना तिरलोक जी का पेशा था। पैसे की फिक्र कभी नहीं की जिसने दिया उसे पढ़वाया , जिसके पास पैसा नहीं था या जिसने नही दिया उसे भी पढवाया । कामरेड की मास्को यात्रा , संस्कार धानी के साहित्यिक आरोह अवरोहों , संस्थाओं की जुड़्न-टूटन को खूब करीब से देख कर भी दादा ने इस के उसे नहीं कही। जो दादा के पसीने को पी गए उसे भी कामरेड ने कभी नहीं लताडा कभी मुझे ज़रूर फर्जी उन साहित्यकारों से कोफ्त हुई जिनने दादा का पैसा दबाया ।
कई बार कहा " दादा अमुक जी से बात करूं...?
रहने दो ...?
यानी गज़ब का धीरज ।
सूरज राय "सूरज" ने अपने ग़ज़ल संग्रह के विमोचन के लिए अपनी मान के अलावा मंच पे अगर किसी से आशीष पाया तो वो थे :"तिरलोक सिंह जी "। इधर मेरी सहचरी ने भी कर्मयोगी के पाँव पखार ही लिए। हुआ यूँ कि सुबह सवेरे दादा मुझसे मिलने आए किताब लेकर आंखों में दिखना कम हों गया था,फ़िर भी आए पैदल । सड़क को शौचालय बनाकर गंदगी फैलाने वाले का मल उनके सेंडिल में.... मेन गेट से सीढियों तक गंदगी के निशान छपाते ऊपर आ गए दादा. अपने आप को अपराधी ठहरा रहे थे जैसे कोई बच्चा गलती करके सामने खडा हो. इधर मेरा मन रो रहा था कि इतना अपनापन क्यों हो गया कि शरीर को कष्ट देकर आना पड़ा दादा को .संयुक्त परिवार के कुछ सदस्यों को आपत्ति हुयी की गंदगी से सना बूढा आदमी गंदगी परोस गया गेट से सीढी तक . सुलभा के मन में करूणा ने जोर मारा . उनके पैर धुलाने लगी . मानव धर्म के आधार में करुणा का महत्त्व सुलभा से बेहतर कौन समझ पाया होगा तब. . तिरलोक जी का आशीर्वाद लेकर सुलभा ने जाने कितना कुछ हासिल किया मुझे नहीं मालूम . मेरे और अन्य साहित्यकारों के बीच के सेतु तिरलोक जी फिर एकाध बार ही आए अब तो बस आतीं हैं उनकी यादें दस्तक देने मन के दरवाजे तक ऐसा सभी साथी महसूस करते हैं.
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