- आप को इश्क़ है तो
- मन प्याली, मदिरा थी प्रीत ..! ह्रदय की सुराही तौ पर न रीती
- तेरी पूजा के तरीके से बेख़बर हूं मैं न ही उपवास मुझसे हो पाया !
- हम तो तंतु कसे कसे से ठोकर से सरगम ही देंगे
- जन्म दिन मुबारक हो मन्ना डे साहब
- आज़ सुनिये ये गीत
- पाबला जी पगडी में क्या है सुनिये शरद कोकास से
- आवाज़ पे सुनिये एक गीत जो यादों को सहला गया
- राज कपूर की फ़िल्मों के गीत
- मेरा पसंदीदा गीत आप भी सुनिये
- स्निग्धा तु मेरी सासों में घोल रहीं थी अमिय
- सानिया कहा था न कल्लू पहलवान हुंकार भरेंगें
- महफ़ूज़ अली की कविता वाली टी शर्ट पहनेंगे अमेरिकन
- सानिया से ज़्यादा ज़रूरी है संजय पर बात
- गढ़ के दोष मेरे सर कौन मढ़ रहा कहो ?
- गढ़ के दोष मेरे सर कौन मढ़ रहा कहो ?
- इश्क प्रीत love
- रे इश्क की तासीर यही है
- podcast
- शहरोज़ जी को पहली बार रंगा था उनकी प्रेमिका ने:पाडकास्ट इंटरव्यू
- अदा जी की आवाज़ में सुनिए तेरी आँखों के सिवा
- तुम्हें प्यार करना चाहता हूँ !!
- दिलों को जीतने का शौक :जीतने का हुनर भी
- प्रीत का यह रूप
- झूठ है आज का ग्रहण सबसे लंबा ग्रहण नहीं था
- अणु-अणु सँवर-सँवर तिल-तिल मिट-मिट पूरा करार करतीं हूँ
- प्रिया तुम्हारी पैजन छम-छम
- मिर्ज़ा ग़ालिब
- प्रिय बिन बैरन-सी लगे पायल की झंकार
- वेब दुनिया पर इश्क प्रीत love की चर्चा
- तापसी-उर्मिला
- तुम्हारी सादगी ही उनके
- तुम यौवन की राजकुमारी में पीड़ा शहजादा हूँ
- हम ठहरे पलटवारी
- आँगन के कचनार
- , प्रेम,गीत- प्रेमकविता,
- मन अनुरागी जोगी तेरा हम-तुम में कैसी ये अनबन
- इनको आज सुनना ज़रूरी है...!!
- प्रेम पत्र के साथ गुज़ारा कब तक करूँ कहो तुम प्रियतम
- प्यार की ख़ूबसूरत रिवायतों से रूबरू कराते ये गीत
- मेलोडी ऑफ़ लव
- गीत सुनिए जानिये हाले दिल
- आज तुमसे न मिल पाना तुम्हारे होने को परिभाषित कर गया
- बस यही है प्रेम तपस्या तापसी
- तनेज़ा जी क्या करूं इस नोटिस का ?
- आज इस गीत से काम चलेगा.?
- सन्मुख प्रतिबंधों के कब तलक झुकूं कहो
- प्रीत निमंत्रण ..!
- आभार हिंदयुग्म
- भेज दो लिख कर ही प्रेम संदेश
- चर्चा का नया रंग
- प्रेम दीप जो तुमने बारे
- आर्ची
- ध्वनि-हीन संवाद
- Tribute to Talat Mehmood Sahab
- मेरी प्रेमिका के कारण
- मागों तो दिल और जाँ सब कुछ तुमको दे दूंगीं
- वंदे मातरम
- बारिश को तरसते हम सुनें ये प्रेम गीत
- जाग विरहनी प्रियतम आए
- " स्मरणीय काव्य संध्या"
- विकास परिहार नहीं रहे !
- लगातार सब ठोकर दे कर वो हँसे जा रहा है
- लगातार सब ठोकर दे कर वो हँसे जा रहा है
- एक ख़त : पहले प्यार को
- इश्क का देवता शुक्र और आज शुक्रवार है जी
- आई ए एस होने का अर्थ ?
- तुम बिन सच कितना खाली सा मेरे मन का जोगी दर्पण
- संजू बाबा का जन्म दिन है भाई आज
- इनको खोज लाइए इनाम में पाइए..? सॉरी इनाम की घोषणा बाद में
- लव कैलकुलेटर के सनसनीखेज परिणाम ज़रूर देखिये जी
- इस कविता का कोई भी उपयोग करे कोई आपत्ति नहीं
- पंडित ईश्वरी प्रसाद तिवारी :
- यह पोस्ट उन लोगों के लिए समर्पित है जो दफ्तर के खर्च पर ब्लागिंग का मुहिम चला रहें हैं
- कुत्ते भौंकते क्यों हैं.........?
- मुझे शुभकामनाएं -चाहिए
- आप को क्लासिफाइड की मुफ्त सुविधा मिले तो
- शिर्डी-साई की भक्ति से सराबोर बावरे-फकीरा एलबम ऐसे प्राप्त कीजिए
- ख़त सुधि ब्लागर्स के नाम
- समय दिन और पल
- मुन्नी अब मुस्कुरायेगी
- सियासी मित्रो जान लो :: शब्दों के साथ ज़हर उगलना तालिबानी कल्चर है
- बावरे फकीरा लांचिंग फोटो एलबम
- बवाल:तेरा तुझको अर्पण /
- दोस्त हम तो ज़मीं को सलाम करतें है..!!
- बवाल का कमाल : न हंगामा न बवाल ....!!
- हर कण की "क्षण-स्मृति" : हर क्षण की कण स्मृति
- वैलेंटाईन या विलेनटाइम या की वेल-इन-टाइम
मयकदा पास हैं पर बंदिश हैं ही कुछ ऐसी ..... मयकश बादशा है और हम सब दिलजले हैं !!
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12 जून 2010
इश्क प्रीत लव पर अब तक
इश्क प्रीत लव पर अब तक प्रस्तुत ब्लाग्स सादर प्रस्तुत हैं आप भी पुरानी पोस्ट के लिंक दे सकते हैं ब्लॉगवाणी की सहायता से
28 जून 2009
कहानी:"हाँ मुझे भी तुमसे इश्क है "
"१०१२ वीं पोस्ट एक प्रेम कहानी "संयोग ही था कि सुषमा के भावों को समझने में उसे बेहद देर लगी उससे भी ज़्यादा देर हुई संकेत समझ कर अनुवादन में. आज जब संस्कारों के पर्वत को पार कर नेह निमंत्रण देती आँखों में झांका तो एक तपस्वनी सी लग रही थी वो मुझे..? विपरीत परिस्थिति में मेरा साथ निभाती वो साँवली सलोनी मूरत अक्सर मेरी उदासी को अपनी उदासी मेरे उछाह को अपना उछाह समझती थी तब एक भी बार मन में इसका कारण मुझे न समझ आना और फिर अचानक ..............एक दिन जब मुझे लगा कि सुषमा मेरी नेह निमंत्रिका है तब तक समय का पाखी सथियों को अपने परों में लपेट कर इतनी दूर जा चुका था कि किसी भी सूरत में उससे उन स्थितियों को वापस लाना संभव न था.
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
"सुषमा जी, आप चाहें तो इस काम को कल निपटाइए . "
"न सर, फिर हेड आफिस से कोई फरमान आ जाएगा तो फिर ..?"
"हाँ, ये तो है, पर अब देर भी तो ...?"
"कोई बात नहीं सर "
सुषमा ने सहजता से उस काम को अंतिम रूप दिया जो मेरे लिए एक उपलब्धि होने जा रहा था . अगले ही दिन हेड ऑफिस का फरमान आया कि दो घंटे में सर्वे रिपोर्ट तैयार हो जाए . तब जाकर लगा कि सुषमा आगे तक परफेक्ट सोच वाली है जिस काम के लिए अन्य मातहत टालमटोल कर रहे थे सुषमा ने समय के पूर्व ही निपटा दिया . बावजूद इसके मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सी बात मुझसे जोड़ रही थी उसे . जो हर पल सुषमा बेचैन रहती किसी न किसी बहाने मेरे इर्द गिर्द बने रहने के लिए
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बीमारी की वज़ह से तीन दिन की सी एल के आवेदन के साथ एक पेपर लगा था जिसमें कई सारे सरकारी अधूरे काम का ज़िक्र था . कैसे और कब तक किससे से कराना संभव होगा स्पष्ट रूप से लिखा था . पहला दिन तो यूं ही गुज़र गया किन्तु दूसरी सुबह बिना सुषमा के ऑफिस ऑफिस सा नहीं लग रहा था . चैम्बर का दरवाजा खुलता तो लगता सुषमा आ रहीं हैं . कई बार घंटी बजा कर प्यून बुलाया सुषमा को बुलाने को कहना चाहा फिर याद आते ही वापस भगा दिया .साथ-साथ रहते कोई बात समझ न आए वो बात तब आसानी से मन मीत के अभाव में ज़रूर समझ में आती है . आज एहसास हुआ कि सुषमा केवल कर्मचारी नहीं मेरे दिल की अधिकारी है.... जैसे तैसे लंच तक अपने आप को जप्त किया और बॉस को छुट्टी का मेल कर ऑफिस से निकला . घर गोया कहीं ज़्यादा वीरान लग रहा था क्या करुँ कहाँ जाऊं कुछ समझ में न आया फिर बदहवास सा घर से सीधे फ्लेट नंबर डी-22 में पहुँच गया जी सुषमा का यही घर कभी एक बार छोड़ने आया था और तीन बरस बाद आज आया .कई बार सोच विचार कर काल बेल न दबा सका. उलटे पाँव वापस जा रहा था कि नीचे सीडियों से पीली चेक साडी में लिपटी सुषमा ऊपर आती नज़र आयी . पास आते ही पूछ बैठी "सर,कोई ख़ास बात . ?"
मैं-"नहीं,वो मेरा मित्र प्रभात है न यहीं डी-21 में जो रहता है ! "
अरे सर बताया था न वो लोग नर्मदा रोड में चले गए सर आपका कार्ड भी तो था उनके गृह प्रवेश का याद कीजिए .
अपनी चोरी पकडी जान मन में अजीब सा अपराध बोध लिए ज़ल्द लौटना चाहता था .किन्तु सुषमा के आगृह ने गोया पाँव गस दिए . सुषमा के पीछे पीछे आज्ञाकारी सेवक सा हो लिया.
कालबेल बजाते ही सुषमा के पापा ने दरवाजा खोला . परिचय तो था ही सो बात चीत का सिलसिला पापा से चल निकला बातों बातों में मुझे बताया कि सुषमा को देखने कोई आने वाले हैं . सुन कर यूं लगा मानो किसी मज़बूत मकान को अर्रा के गिरते देख रहा हूँ ?
चाय-नास्ते के बाद वापस लौटते वक़्त मेरे उदास चेहरे को बांच उसने पूछा:"सर,उदास क्यों हैं ? कोई ख़ास वज़ह ?"
"हाँ,मैं कोई काम वक़्त पर नहीं करता जिससे मुझे कई बार नुकसान हुआ है "
सर, यदि ऑफिस का कोई प्राबलाम्ब हो तो मैं चलूँ ?
नहीं सुषमा, ज़िन्दगी का है तुम आने वालों का ध्यान रखो,
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ठीक तीसरे दिन , ऑफिस का नंबर सेल फोन पर ब्लिंक हुआ. दो बार मिस्ड होने के बाद तीसरी बार जब सुषमा का नंबर ब्लिंक हुआ तो उठाना लाज़मी था. अनमने ढंग से मेरा हेलो कहना उसे नागवारा गुज़रा. उसने मुझसे पूछा "ज़्यादा तबीयत खराब है ?"
"हाँ ?"
"सर, मैं आती हूँ "
ठीक पंद्रह मिनट बाद सुषमा फ्लेट में थी. मैंने कहा "क्यों कष्ट कर रहीं हैं आप ?"
"इसमें कष्ट क्या ............ आप वक्त पर काम नहीं करते आप मासूम भी हैं मुझे आपकी कमजोरी का ज्ञान है "
"क्या मतलब, मेरी तनाव ग्रस्त पेशानी पर हाथ रख सुषमा चहक उठी तीन दिन में ये हाल कर लिया ज़िन्दगी कैसे काटेंगे आप मेरे बगैर अनिमेष......?"
सर से अनिमेष संबोधन सुन मेरे मन में शांत पडा अभिव्यक्ति का ज्वालामुखी अचानक फूट पडा-" हाँ मुझे भी तुमसे इश्क है तुमसे ही पर अब क्या फायदा अब तो तुम यू एस ए जाओगी एन आर आई से ब्याह के !!"
"अनिमेष, तुम जैसी कमज़ोर नहीं हूँ मैंने उसे बता दिया था कि में अनिमेष से प्यार करतीं हूँ "
21 मई 2009
अपनी शक्ति के अनुप्रयोग से दूर
तुम जो सरकारें बनाते हो
तुम जो सरकारें सजाते हो
तुम जो जनतंत्र हो
कोई अपराधी नहीं
तो फिर क्यों
अपनी शक्ति के
अनुप्रयोग से दूर थे
तुम्हारा यही निठ्ल्ला-पन
तुमको एक बार फिर गुलाम
बना सकता है
जैसे अभी भी हो
आयातित विचारों के गुलाम
- गिरीश बिल्लोरे"मुकुल"
27 दिस॰ 2008
16 जून 2008
पितृ-दिवस की कविता
मेरे सपने साथ ले गए
दुख के झंडे हाथ दे गए !
बाबूजी तुम हमें छोड़ कर
नाते-रिश्ते साथ ले गए...?
*********
काका बाबा मामा ताऊ
सब दरबारी दूर हुए..!
बाद तुम्हारे मानस नाते
ख़ुद ही हमसे दूर हुए.
*********
अब तो घर में मैं हूँ माँ हैं
और पड़ोस में विधवा काकी
रोज़ रात कटती है भय से
नींद अल्ल-सुबह ही आती.
*********
क्यों तुम इतना खटते थे बाबा
क्यों दरबार लगाते थे
क्यों हर एक आने वाले को
अपना मीत बताते थे
*********
सब के सब विदा कर तुमको
तेरहीं तक ही साथ रहे
अब हम दोनों माँ-बेटी के
संग केवल संताप रहे !
*********
दुनिया दारी यही पिताश्री
सबके मतलब के अभिवादन
बाद आपके हम माँ-बेटी
कर लेगें छोटा अब आँगन !
• गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"
दुख के झंडे हाथ दे गए !
बाबूजी तुम हमें छोड़ कर
नाते-रिश्ते साथ ले गए...?
*********
काका बाबा मामा ताऊ
सब दरबारी दूर हुए..!
बाद तुम्हारे मानस नाते
ख़ुद ही हमसे दूर हुए.
*********
अब तो घर में मैं हूँ माँ हैं
और पड़ोस में विधवा काकी
रोज़ रात कटती है भय से
नींद अल्ल-सुबह ही आती.
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क्यों तुम इतना खटते थे बाबा
क्यों दरबार लगाते थे
क्यों हर एक आने वाले को
अपना मीत बताते थे
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सब के सब विदा कर तुमको
तेरहीं तक ही साथ रहे
अब हम दोनों माँ-बेटी के
संग केवल संताप रहे !
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दुनिया दारी यही पिताश्री
सबके मतलब के अभिवादन
बाद आपके हम माँ-बेटी
कर लेगें छोटा अब आँगन !
• गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"
9 जून 2008
प्रेमगीत
बदल-बदल के लिबास पहनो,
जो दिल बदल दो तो वाह कर लूँ !!
#######
न तुम चुराओ नज़र कभी भी,
न कनखियों से निहारो मुझको !
मैं चाहता हूँ प्रिया सहज हो
जहाँ भी चाहो पुकारो मुझको !!
ये इश्क गरचे गुनाह है तो, है दिल की चाहत गुनाह कर लूँ...?
#######
कहो कि तुमको है इश्क़ हमसे
तो पहली बारिश में जा मैं भीगूँ,!
अगरचे तुम ने कहा नहीं कुछ
तो मैं ज़हर के पियाले पीलूँ !!
ज़हर को पीना गुनाह है तो,है दिल की चाहत गुनाह कर लूँ...?
जो दिल बदल दो तो वाह कर लूँ !!
#######
न तुम चुराओ नज़र कभी भी,
न कनखियों से निहारो मुझको !
मैं चाहता हूँ प्रिया सहज हो
जहाँ भी चाहो पुकारो मुझको !!
ये इश्क गरचे गुनाह है तो, है दिल की चाहत गुनाह कर लूँ...?
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कहो कि तुमको है इश्क़ हमसे
तो पहली बारिश में जा मैं भीगूँ,!
अगरचे तुम ने कहा नहीं कुछ
तो मैं ज़हर के पियाले पीलूँ !!
ज़हर को पीना गुनाह है तो,है दिल की चाहत गुनाह कर लूँ...?
17 मई 2008
श्री राम ठाकुर "दादा"
चुटीले व्यंगकार श्री राम ठाकुर दादा की कृतियाँ अफSAR KO NAHIN DOSH GUSHAIN ,DAANT DIKHANE KE ,आईं लोकप्रिय रहीं और उनको राष्ट्रीय स्तर पे पहचान मिलने के बाद उनकी नवीनतम कृति
मERI EK SOU IKKIS LAGHUKATHAYEN ,अब उपलब्ध है।
मERI EK SOU IKKIS LAGHUKATHAYEN ,अब उपलब्ध है।
12 मई 2008
हेमराज जैन : स्पर्श से आंकलन
पूरा दिन घर के पीछे लगे छोटे से पेढ़ पोधों की सेवा में लगे रहने वाले हेमराज जी का जीवन दुनियाँ के लिए उपहार से कम कदापि नहीं....इसके कई प्रमाण हैं,किंतु इस बात को आगे बढाना चाहता हूँ ताकि पोस्ट के नायक के साथ कोई भेदभाव न हो सके :-
इस हीरे पर वैद्यनाथ की नज़र न पड़ी होती तो इंग्लिस्तान के काय-विज्ञानियों के लिए हेमराज जी ने जो मानव शरीर की अंत: आकृतियों की रचना की एनोटोमी के अध्ययन के लिए अद्भुत सृजन भी कतई न हो पाता।
केवल अध्ययन से शरीर की नसों-शिराओं का हू ब हू चित्रांकन , वह भी उस दौर में जब न तो एक्स-रे था,नाही सोनोग्राफी - किसी विशेष अंतर्ज्ञान के बगैर ऐसा कुछ भी सम्भव न होता। मुझे अच्छी तरह से याद है ४ वर्ष पूर्व जब जैन परिवार नया घर बनवा रहा था ..... भवन के आर्किट्रेक्चर को लेकर उनके सवालों से इंजिनियर भी निरुत्तर हो जाते थे। दीवार बीम कालम सभी की स्थिति हेमराज जी केवल छू कर ज्ञात कर लेते थे। जबकि उनकी आंखों ने देखना लग भग बंद ही कर दिया था।
पहली बार मुझे शब्द-भेदी-शर-साधकों के अस्तित्व पर यकीन हुआ ।
श्री हेमराज जैन के प्रति आदर के साथ आप सबका आभारी हूँ जिननें विस्तार से लेखन के लिए प्रेरित किया।
इस हीरे पर वैद्यनाथ की नज़र न पड़ी होती तो इंग्लिस्तान के काय-विज्ञानियों के लिए हेमराज जी ने जो मानव शरीर की अंत: आकृतियों की रचना की एनोटोमी के अध्ययन के लिए अद्भुत सृजन भी कतई न हो पाता।
केवल अध्ययन से शरीर की नसों-शिराओं का हू ब हू चित्रांकन , वह भी उस दौर में जब न तो एक्स-रे था,नाही सोनोग्राफी - किसी विशेष अंतर्ज्ञान के बगैर ऐसा कुछ भी सम्भव न होता। मुझे अच्छी तरह से याद है ४ वर्ष पूर्व जब जैन परिवार नया घर बनवा रहा था ..... भवन के आर्किट्रेक्चर को लेकर उनके सवालों से इंजिनियर भी निरुत्तर हो जाते थे। दीवार बीम कालम सभी की स्थिति हेमराज जी केवल छू कर ज्ञात कर लेते थे। जबकि उनकी आंखों ने देखना लग भग बंद ही कर दिया था।
पहली बार मुझे शब्द-भेदी-शर-साधकों के अस्तित्व पर यकीन हुआ ।
श्री हेमराज जैन के प्रति आदर के साथ आप सबका आभारी हूँ जिननें विस्तार से लेखन के लिए प्रेरित किया।
20 फ़र॰ 2008
तनवीर ने मेरी यह रचना
सत्य के पुजारी, पाडकास्ट पे सुनिए मेरी बात
सम्बंधों की व्यावसायिकता और व्यवसायिकता के लिये सम्बंधों के लिये जाने जाना वाला यह समय कुल मिलाकर जड़ता का समय है। जीवनों के बीच केवल सम्बंध शब्द के अर्थ को समझना है तो थोड़ा सा बाजारवाद पर नज़र डालें। मैं यदि एक वस्तु बेच रहा हूँ तो ये बाजारवाद आप के लिये मुझमें केवल एक खरीददार का भाव पैदा कर देना होता है और आज इसकी खास ज़रूरत है। यदि विक्रेता के तौर पर यदि मैं यह कर सका तो तय है कि मैं सफल हूँ, व्यवसायिकता के लिये योग्य हूँ।
तुमसे मेरा न कोई लेना देना था, न रहेगा, रहेगी तुम्हारे पास मेरी बेची हुई वस्तु और मेरे पास तुम्हारा पैसा जो कल पूँजी बन कर निगलने को आतुर होगा - समूचे मानव मूल्य।
घबराईए मत बदलते दौर में पूँजीवाद के बारे में मैं नकारात्मक नहीं हूँ। मैं तो सम्बंधों की व्यवसायिकता बनाम व्यवसायिकता के लिये सम्बंध पर एक विमर्श करना चाहता हूँ।
प्रथमत: सफल प्रोफेशनल्स के मामले में आप सहमत हो ही गए होगें।
नहीं तो अब हो जाएंगे- एक बार एक अधिकारी ने सम्पूर्ण उर्जा का दोहन कर उसके मातहत को जाते-जाते कहा- “तुमसे मेरे बेहतरीन प्रोफेशनल रिलेशन थे, इसके अलावा और कुछ नहीं।”
सम्बंधों का रसायन समझ मातहत ने अब अपनी क्षमता और भावात्मकता को पृथक-पृथक कर दिया।
क्षमता के सहारे व्यवसायिक व्यापारिक सम्बंधों का निवर्हन करता- उसके मन में अब अपने संस्थान के लोगों से प्रबंधन से सिर्फ केवल व्यवसायिक सम्बंध हैं।
यह तो संस्थानों की बात है। यहाँ यह एक हद तक जायज है। हद तो तब हो गई- संवेदनाओं की वकालत करने वाला एक शख्स -शहर में अपने अव्यवसायिक होने का डिण्डौरा मण्डला से डिण्डौरी तक पीट मारा। वो और उसके चेले-चपाटी जुट गए, अव्यवसायिकता की आड़ में व्यवसायिकता के ताने-बाने बुनने। सफल भी रहे- बहुतेरों को अपने सौम्य व्यक्तित्व के सहारे बेवकूफ बनाने में।
कुछ तो मूर्ख नहीं बने, वो उसके लिये भात का कंकड़ ज़रूर बने।
सुधि पाठकों - हमारे इर्द गिर्द अब केवल ऐसे लोग ही रह गए हैं उन लोगों की सूची कम होती जा रही है। जो मानवीय गुणों के आधार पर सम्बंध बनाते हैं।
कमोवेश सियासत में भी यही सब कुछ है उन भाई ने बड़ी गर्मजोशी से हमारा किया। माँ-बाबूजी ओर यहाँ तक कि मेरे उन बच्चों के हालचाल भी जाने जो मेरे हैं हीं नहीं। जैसे पूछा-
“गुड्डू बेटा कैसा है।”
“भैया मेरी 2 बेटियाँ हैं।”
“अरे हाँ- सॉरी भैया- गुड़िया कैसी है, भाभी जी ठीक हैं। वगैरा-वगैरा। यह बातचीत के दौरान उनने बता दिया कि हमारा और उनका बरसों पुराना फेविकोलिया-रिश्ता है।
हमारे बीच रिश्ता है तो जरूर पर उन भाई साहब को आज क्या ज़रूरत आन पड़ी। इतनी पुरानी बातें उखाड़ने की। मेरे दिमाग में कुछ चल ही रहा था कि भाई साहब बोल पड़े - “बिल्लोरे जी चुनाव में अपन को टिकट मिल गया है।”
“कहाँ से, बधाई हो सर”
“.... क्षेत्र से”
“मैं तो दूसरे क्षेत्र में रह रहा हूँ। यह पुष्टि होते ही कि मैं उनके क्षेत्र में अब वोट टव्ज्म् के रूप में निवास नहीं कर रहा हूँ। मेरे परिवार के 10 वोटों का घाटा सदमा सा लगा उन्हें- बोले – “अच्छा चलूं जी !”
पहली बार मुझे लगा मेरी ज़िंदगी कितनी बेकार है, मैं मैं नहीं वोट हूँ।
13 फ़र॰ 2008
चोरी या तकनीकी गलती
मेरी भास्कर में छप चुकी रचना का तनवीर जाफरी के नाम से प्रकाशन
जीवन की बंजर भूमि में
तनवीर जाफ़री
सम्बंधों की व्यावसायिकता और व्यवसायिकता के लिये सम्बंधों के लिये जाने जाना वाला यह समय कुल मिलाकर जड़ता का समय है। जीवनों के बीच केवल सम्बंध शब्द के अर्थ को समझना है तो थोड़ा सा बाजारवाद पर नज़र डालें। मैं यदि एक वस्तु बेच रहा हूँ तो ये बाजारवाद आप के लिये मुझमें केवल एक खरीददार का भाव पैदा कर देना होता है और आज इसकी खास ज़रूरत है। यदि विक्रेता के तौर पर यदि मैं यह कर सका तो तय है कि मैं सफल हूँ, व्यवसायिकता के लिये योग्य हूँ।
तुमसे मेरा न कोई लेना देना था, न रहेगा, रहेगी तुम्हारे पास मेरी बेची हुई वस्तु और मेरे पास तुम्हारा पैसा जो कल पूँजी बन कर निगलने को आतुर होगा - समूचे मानव मूल्य।
घबराईए मत बदलते दौर में पूँजीवाद के बारे में मैं नकारात्मक नहीं हूँ। मैं तो सम्बंधों की व्यवसायिकता बनाम व्यवसायिकता के लिये सम्बंध पर एक विमर्श करना चाहता हूँ।
प्रथमत: सफल प्रोफेशनल्स के मामले में आप सहमत हो ही गए होगें।
नहीं तो अब हो जाएंगे- एक बार एक अधिकारी ने सम्पूर्ण उर्जा का दोहन कर उसके मातहत को जाते-जाते कहा- “तुमसे मेरे बेहतरीन प्रोफेशनल रिलेशन थे, इसके अलावा और कुछ नहीं।”
सम्बंधों का रसायन समझ मातहत ने अब अपनी क्षमता और भावात्मकता को पृथक-पृथक कर दिया।
क्षमता के सहारे व्यवसायिक व्यापारिक सम्बंधों का निवर्हन करता- उसके मन में अब अपने संस्थान के लोगों से प्रबंधन से सिर्फ केवल व्यवसायिक सम्बंध हैं।
यह तो संस्थानों की बात है। यहाँ यह एक हद तक जायज है। हद तो तब हो गई- संवेदनाओं की वकालत करने वाला एक शख्स -शहर में अपने अव्यवसायिक होने का डिण्डौरा मण्डला से डिण्डौरी तक पीट मारा। वो और उसके चेले-चपाटी जुट गए, अव्यवसायिकता की आड़ में व्यवसायिकता के ताने-बाने बुनने। सफल भी रहे- बहुतेरों को अपने सौम्य व्यक्तित्व के सहारे बेवकूफ बनाने में।
कुछ तो मूर्ख नहीं बने, वो उसके लिये भात का कंकड़ ज़रूर बने।
सुधि पाठकों - हमारे इर्द गिर्द अब केवल ऐसे लोग ही रह गए हैं उन लोगों की सूची कम होती जा रही है। जो मानवीय गुणों के आधार पर सम्बंध बनाते हैं।
कमोवेश सियासत में भी यही सब कुछ है उन भाई ने बड़ी गर्मजोशी से हमारा किया। माँ-बाबूजी ओर यहाँ तक कि मेरे उन बच्चों के हालचाल भी जाने जो मेरे हैं हीं नहीं। जैसे पूछा-
“गुड्डू बेटा कैसा है।”
“भैया मेरी 2 बेटियाँ हैं।”
“अरे हाँ- सॉरी भैया- गुड़िया कैसी है, भाभी जी ठीक हैं। वगैरा-वगैरा। यह बातचीत के दौरान उनने बता दिया कि हमारा और उनका बरसों पुराना फेविकोलिया-रिश्ता है।
हमारे बीच रिश्ता है तो जरूर पर उन भाई साहब को आज क्या ज़रूरत आन पड़ी। इतनी पुरानी बातें उखाड़ने की। मेरे दिमाग में कुछ चल ही रहा था कि भाई साहब बोल पड़े - “बिल्लोरे जी चुनाव में अपन को टिकट मिल गया है।”
“कहाँ से, बधाई हो सर”
“.... क्षेत्र से”
“मैं तो दूसरे क्षेत्र में रह रहा हूँ। यह पुष्टि होते ही कि मैं उनके क्षेत्र में अब वोट टव्ज्म् के रूप में निवास नहीं कर रहा हूँ। मेरे परिवार के 10 वोटों का घाटा सदमा सा लगा उन्हें- बोले – “अच्छा चलूं जी !”
पहली बार मुझे लगा मेरी ज़िंदगी कितनी बेकार है, मैं मैं नहीं वोट हूँ।
तनवीर जाफ़री
सदस्य हरियाणा साहित्य अकादमी
2240/2, नाहन हाऊस
अम्बाला शहर, हरियाणा
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