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22 जून 2013

sameeksha: sumitra ji ke jijivishajayee vyangya dohe -acharya sanjiv verma 'salil'

सृजन चर्चा
        
  सुमित्र जी के जिजीविषाजयी व्यंग्य दोहे
 आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'  
*
 

 सनातन सलिल नर्मदा का अंचल सनातन काल से सृजनधर्मियों का साधना क्षेत्र रहा है. सम-सामयिक साहित्य सर्जकों में अग्रगण्य डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' विविध विधाओं में अपने श्रेष्ठ सृजन से सर्वत्र सतत समादृत हो रहे हैं।

दोहा हिंदी साहित्य कोष का दैदीप्यमान रत्न है। कथ्य की संक्षिप्तता, शब्दों की सटीकता, कहन की लयबद्धता , बिम्बों-प्रतीकों की मर्मस्पर्शिता तथा भाषा की लोक-ग्राह्यता के पञ्चतत्वी निकष पर खरे दोहे रचना सुमित्र जी के लिए सहज-साध्य है। सामयिकता, विसंगतियों का संकेतन,  विडंबनाऑं पर प्रहार, जनाक्रोश की अभिव्यक्ति और परोक्षतः ही सही पारिस्थितिक वैषम्य निदान की प्रेरणा व्यंग्य विधा के पाँच सोपान हैं। सुमित्र की दशरथी कलम ''विगतं वा अगं यस्य'' की कसौटी पर खरे उतारनेवाले व्यंग्य दोहे रचकर अपनी सामर्थ्य का लोहा मनवाती है।
''आएगा, वह आयेगा, राह देखती नित्य / कहाँ न्याय का सिंहासन, कहाँ विक्रमादित्य'' कहकर दोहाकार आम आदमी की आशावादिता और उसकी निष्फलता दोनों को पूरी शिद्दत से बयां करता है।
समाज में येन-केन-प्रकारेण धनार्जन कर स्वयं को सकल संवैधानिक प्रावधानों से ऊपर समझनेवाले नव धनाढ्य वर्ग की भोगवादी मनोवृत्ति पर तीक्ष्ण कटाक्ष करते हुए निम्न दोहे में दोहाकार 'रसलीन' शब्द का सार्थक प्रयोग करता है- ''दिन को राहत बाँटकर, रात हुई रसलीन / जिस्म गरम करता रहा, बँगले का कालीन'' ।
राजनीति का ध्येय जनकल्याण से बदलकर पद-प्राप्ति और आत्म कल्याण होने की विडम्बना पर सुमित्र का कवि-ह्रदय व्यथित होकर कहता है-
नीतिहीन नेतृत्व है, नीतिबद्ध वक्तव्य।
चूहों से बिल्ली कहे, गलत नहीं मंतव्य।।
*
सेवा की संकल्पना, है अतीत की बात।
फोटो माला नोट है, नेता की औकात।।
*
शैक्षणिक संस्थाओं में व्याप्त अव्यवस्था पर व्यंग्य दोहा सीधे मन को छूता है-
पैर रखा है द्वार पर, पल्ला थामे पीठ।
कोलाहल का कोर्स है, मन का विद्यापीठ।।
*
पात्रता का विचार किये बिना पुरस्कार  चर्चित होने की यशैषणा की निरर्थकता पर सुमित्र दोहा को कोड़े की तरह फटकारते हैं-
अकादमी से पुरस्कृत, गजट छपी तस्वीर।
सम्मानित यों कब हुए, तुलसी सूर कबीर।।
*
अति समृद्धि और अति सम्पन्नता के दो पाटों के बीच पिसते आम जन की मनस्थिति सुमित्र की अपनी है-
सपने में रोटी दिखे, लिखे भूख तब छंद।
स्वप्न-भूख का परस्पर, हो जाए अनुबंध।।
*
आँखों के आकाश में, अन्तःपुर आँसू बसें, नदी आग की, यादों की कंदील, तृष्णा कैसे मृग बनी, दरस-परस छवि-भंगिमा, मन का मौन मजूर, मौसम की गाली सुनें, संयम की सीमा कहाँ, संयम ने सौगंध ली, आँसू की औकात क्या, प्रेम-प्यास में फर्क, सागर से सरगोशियाँ, जैसे शब्द-प्रयोग और बिम्ब-प्रतीक दोहाकार की भाषिक सामर्थ्य की बानगी बनने के साथ-साथ नव दोहकारों के लिए सृजन का सबक भी हैं।

सुमित्र के सार्थक, सशक्त व्यंग्य दोहों को समर्पित हैं कुछ दोहे-

पंक्ति-पंक्ति शब्दित 'सलिल', विडम्बना के चित्र।
संगुम्फित युग-विसंगति, दोहा हुआ सुमित्र।।
*
लय भाषा रस भाव छवि, बिम्ब-प्रतीक विधान।
है दोहा की खासियत, कम में अधिक बखान।।
*
सलिल-धार की लहर सम, द्रुत संक्षिप्त सटीक।
मर्म छुए दोहा कहे, सत्य हिचक बिन नीक।।
*
व्यंग्य पहन दोहा हुआ, छंदों का सरताज।
बन सुमित्र हृद-व्यथा का, कहता त्याग अकाज।।
*
Sanjiv verma 'Salil'

7 जन॰ 2010

हमें हर मामले में उंगली करनें में महारत हासिल है .



अंगुली करने में हम भारत वालों की कोई तोड़ नहीं है ।हमें हर मामले में उंगली करनें में महारत हासिल है .....!गोया कृष्ण जीं ने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पे क्या उठाया हमने उनकी तर्ज़ पर हर चीज़ को अंगुली पे उठाना चालू कर दिया है । मेरे बारे मे आप कम ही जानते हैं ...! किन्तु जब अंगुली करने की बात हो तो आप सबसे पहले आगे आ जायेंगें कोई पूछे तो झट आप फ़रमाएंगे "बस मौज ले रहा था ?" अंगुली करने की वृत्ति पर अनुसंधान करना और ब्रह्म की खोज करना दोनों ही मामलों में बस एक ही आवाज़ गूंजती है "नयाति -नयाति" अर्थात "नेति-नेति" सो अब जान लीजियेजिसे जो भी सीखना है सीख सकता है बड़ी आसानी से ...! जानते हैं कैसे ? अरेभाई केवल अंगुली कर कर के !! मुझ जैसे लोग जो कम्प्युटर का कम भी न जानते थे बस अंगुली कर कर के कम्प्युटर-कर्म सीख गया देखिये मेरी अंगुली को आज तक कुछ भी नहीं हुआ ...! ये अलहदा बात है कि कम्प्यूटर ज़रूर थोड़ा खराब हुआ । इससे आप को क्या शिक्षा मिली ......? यही कि "चाहे जहाँ ,जितनी भी अंगुली करो अंगुली का बाल भी बांका नहीं होगा । इतिहास गवाह है कृष्ण जीं की अंगुली याद करिये !इंद्र की बोलती बंद कर दी योगेश्वर ने उनकी अंगुली का कुछ भी न हुआ. होता भी कैसे प्रभु ने अंगुली बनाते वक़्त उसके अनुप्रयोग के बाद किसी भी विपरीत प्रभाव के न पड़ने का अभय दान सिर्फ अँगुलियों को ही दिया था. आज देखिये कितने लोग सिर्फ अंगुली उठा कर जीवन यापन कर रहें  हैं =>  अब खबरिया/जबरिया टी वी चैनल्स को ही देखिये अंगुली दिखा दिखा के उठा आपकी हालत खराब करना इनकी ड्यूटी है आप इनकी अंगुली पे अंगुली नहीं उठा सकते . यदि आप यह करना भी चाहें तो.........संभव नहीं है कि आप कुछ कर पायेंगें .
इस  पोस्ट  का अगला भाग:-यानि ब्रिगेडियर  मिसिर  कृत  आलेख बांचिये इधर =>;;"भाग-02" 
अथवा इधर  

अम्बेडकर बाबा को  अपुन का विनत प्रणाम

29 दिस॰ 2009

देशी एंटी वायरस- इस्तेमाल करके देखें

का बताएं भैया! हम तो ठेठ गंवईहा ठहरे. कछु कहत हैं तो लोग मजाक समझत हैं. अरे भाई हमको मजाक आती ही नहीं है. लेकिन जो बात दिल से कह देत हैं (बिना दिमाग लगाये) वो मजाक बन जात है ससुरी. अगर हम बात दिमाग लगा के करत हैं तो लोगन का रोवे का परत है, का बताएं बड़ी समस्या हो गई है. अभी हम देखत रहे समस्या चहुँ ओर ठाडी है. टरने को नांव ही नहीं लेत है. लेकिन हम ठहरे गंवईहा बिना समस्या टारे हम ना टरे.
अब देखिये ना कितना शोर मचा रहता है कि कम्पूटर मा  कोई जिनावर घुस गवा है. जिसके कम्पूटर मा घुस जात है उसको कम्पूटर ठाड़ हो जात है, बिगाड़ हो जात है. कच्छू करई नई देत है. हम एक भैया से पूछे भैया ये कौन सा जिनावर है जो कम्पूटर को और तुमाये को भी हलाकान कर डारे है? तो उन्होंने बताये के वायरस होत है. एक तरह को कीट है. तो हमने पूछो "कम्पूटर में कीट को काय काम है?" तो बोले जब इंटरनेट चलत है तो जो दुश्मन बैरी होय ना, वो अपनों जासूस भेज देत है हलाकान करबे के लिए. ये कीट भी दो तरह के होत हैं, एक है मित्र कीट दुसर है दुश्मन कीट, फेर दुश्मन कीट के हटाने के लाने मित्र कीट को बुलाओ फेर दुनो में लड़ाई होत है और मित्र कीट दुश्मन कीट को खा के ख़तम कर देत है. बस इत्ती सी बात है. अब वा के लिए तो इत्ती सी बात है और हमारे जैसे देहाती गंवईहन के लिए इत्ती सारी बात है. हमारे तो भेजे में ही नहीं घुसी. चलो भलो हुवो भेजे मे नहीं घुसी, नहीं तो माथ अलग पिराई और डाक्टर की भेट पूजा अलग होती.
अब जो हमारे मित्र रहे कम्पूटर वारे, वो बुलागर रहे. कम्पूटर मा लिखत रहे, लिख लिख के बहुत बड़े लेखक बन गए. बड़ो नांव हो गयो वा को. हमने एक दिन पूछो बताओ तो भैया का लिखत हो? हमको तो कछु पतों चले. तो भईया उनने कम्पूटर खोल के दिखायो और वो बांचन लागे हम मूड हिला -हिला के सुनत रहे. एक जगह लिखे रहे,  हमकू चड्डी खरीदना है. पुरानी वाली फट गई है, वो पट्टे वाले कपडे की बनी थी अब वो कपड़ा नहीं मिल रहा है. हम बहुत ढूंढ़ डारे, हमारे सारे आस पास के मित्र भी ढूंढ़ डारे, उनको भी नहीं मिल रही है. हम आपसे गुजारिश कर रहे है.कि कोई हमें बता दे कि ये चड्डी को पट्टा वाला कपडा कहाँ मिलेगो. तो बताने वारे को हम बहुत बहुत धन्यवाद देंगे. हम ये चड्डी का कपड़ा इसलिए ढूंढ़ रहे हैं कि इसको धारण करने के बाद स्वर्गिक आनंद आता है. मिल जाये तो आप भी इस्तेमाल करके देखें.
एक जगह वो लिखे रहे हमारी भैंसिया गुम गई है. तालाब में गई थी नहाने. चरवाहों वही भूल गवो, कल से नहीं आई है. हम गांव में बहुत ढूंढ़ लिए, नहीं मिल रही है. भैंसिया जाने के गम में हमारी अम्मा ने रात को दूध नहीं पियो है. उनको बड़ा सदमा लगो है, सुबह-सुबह गश खा के गिर पड़ी. इधर हमारी बीवी भी परेशान किये दे रही है. उनके मईके से दो सारे आये हुए है. गांव में  पहलवानी करते हैं. उनको दूध की जरुरत है. जब से ये आये है इनको देख के भैंसिया फरार हो गई है. अब ये सारे हमारे महीने भर की तनखा को दूध तीन दिन में पी जायेंगे. मोल को दूध बहुतै मंहगो है. ये सारेन को देख के हमरो तो बी पी बढ़ जात है. 
श्रीमती कह रही है के दूध लेके आओ हमारे भैया लोगों के लिए, नहीं तो हम मईके जात हैं और भईया लोगो दूध नहीं मिलत है तो ये बौरा जात है कहत रहे की दूध नहीं मिलो तो जीजी! आज जीजाजी को राम-नाम-सत् समझो. तुम्हारे लिए नयो जीजा ढूंढ़ देंगे. अब बताओ भैया हम फँस गए है. एक तरफ कुंवा दूसरी तरफ खाई, और ये खाई भी हमने एक होंडा के चक्कर में खुदाई. तो भईया बाकी बात तो मैं बाद में भी लिख दूंगा. अभी हमारी भैंसिया को पता बताय दो. आपकी मेहरबानी होगी. मुर्रा नसल की भैंस है टेम्पलेट का रंग काला है. अगल बगल में विजेट लगे हैं. दो कान, दो सींग एक मुहं, दो आंख, चार पैर, एक पूंछ है और एक निशानी है उसके पहचान की, वो जहाँ कही भी जात है, दांत निपोर के पगुरावत रहत है. 
हमने भी कहा क्या बढ़िया लिखते हैं मान गए भैया. आप तो हमारे शहर की नाक है. अब हमें भी कुछ लिखना सीखा दीजिये ना कंप्यूटर में. देखिये अभी एक सुन्दर गजल उतर रही है. लिख तो देंगे लेकिन छापेंगे कहाँ? इस लिए हमें भी ये बुलागरी सीखा दीजिये. 
अब उनसे गुरु मन्त्र पा के नर्मदा मैईया को नांव ले के बुलागरी चालू कर दी. अब जैसे ही हमने दो चार गजल लिखी हमारे कम्पूटर पे भी दुश्मन कीट को हमला हो गवो. हमने इजीनियर बुलावो तो उसने बताया कि इन दुश्मन कीटों को मारने के लिए एक हजार को खर्च है  मित्र कीट की फ़ौज बुलानी पड़ेगी. हम तो डर गए थे. दे दिये हजार रूपये, भईया वो इंजिनियर हजार रूपये की सीडी लाया और हमारे कम्पूटर में लगा के बोला" अब ठीक हो गया है" कोई समस्या नहीं है. कुछ दिन भईया बढ़िया चलो कम्पूटर, फेर एक दिन खड़ो हो गवो. चल के नहीं दे. हमने सोचा इंजिनियर बुलाएँगे, वो फेर हजार रूपये ले जायेगा. मित्र कीट डाले हैं करके मुरख बना के चले जायेगा. 
तो हमने भी जुगत लगाईं और इसकी देशी दवाई करबे की सोची. भाई देशी दवाई बहुत फायदा करत है. बस रोग पकड़ में आ जाये. हमारे घर में लकड़ी के चक्का वारी बैल गाड़ी है. वा में जब चक्का जाम हो जाय, तब कालू राम काला वाला मोबिल आईल पॉँच रूपये का डालते रहे हैं. गाड़ी भी बढ़िया चलत है और बैलान को भी आराम है. वो भी दुआ दे रहे हैं. तो हमने ठान लिया देशी इलाज करना है कम्पूटर का. पाच रूपये का तेल मंगाए और डाल दिये कम्पूटर में. 
बस फिर क्या था? तब से हमारा कम्पूटर शानदार चल रहा है. अब बता देते हैं क्या हुआ? जैसे ही हमने काला मोबिल आईल डाला, सारे दुश्मन कीट (वायरस) का मुंह काला हो गया. अब उनको डर हो गया. अगर बाहर निकले तो पहचाने जायेंगे, काला मुंह लेके कहाँ जायेंगे? जो देखेगा वो दुत्कारेगा. और बिरादरी वाले भी बोलेंगे.  कहाँ काला मुंह करवा के आये हो? इसलिए उस दिन से वो हमारे कम्पूटर में दुबके बैठे है. बाहर निकालने की हिम्मत नहीं कर रहे और हम मजे से बुलागरी कर रहे हैं. अगर आपको भी कम्पूटर में कोई वायरस की समस्या हो तो देशी ईलाज करके देखो. हमने किया है और उसका भरपूर लाभ उठा रहे है. बुजुर्ग कहत रहे "फायदे की चीज हो तो सबको बताओ और घाटे की है तो हजम कर जाओ, इसलिए ये बात हम बुजुर्गों का सम्मान करते हुए कह रहे हैं. भईया हम तो गंवईहा ठहरे.

ललित शर्मा, लीजिये छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का आनंद 

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                     ::  कमांडर के आदेश  ::
इस धारदार जानदार पोस्ट के 24 घंटे बाद ही कोई ब्रिगेडीअर पोस्ट
                                चिपकाएँगें 
आदेश का तत्काल पालन सुनिश्चित हो

28 मार्च 2009

परसाई ,ठाकुर दादा,के शहर में व्यंग्य की परिभाषा तलाशती खोपडियां


सुना है इन दिनों शहर व्यंग्य की सही और सटीक परिभाषा में उलझा हुआ है।
बवाल जी ने फोन पे पूछा - भैया ये सटायर की कोई नई परभाषा हो गई है क्या ?
अपन तो हिन्दी और साहित्य की ए बी सी डी नहीं जानते न ही ब्लागिंग की समझ है अपन में , न ही अपनी किसी ब्लागिंग के पुरोधा से ही गिलास-मंग्घे स्तर तक पहंच हैं जो कि उनकी बात का ज़बाव दे सकें सो अपन ने कहा भाई आप तो अपने बीच के लाल बुझक्कड़ हैं उनसे पूछा जाए ।
तभी हमने सड़क पर एक बैसाख नन्दन का दूसरे बैसाख नन्दन का वार्तालाप सुना {आपको समझ में नहीं आएगी उनकी आपसी चर्चा क्योंकि अपने भाई बन्दों की भाषा हम ही समझ सकतें हैं ।} आप सुनना चाहतें हैं..........?
सो बताए देता हूँ हूँ भाई लोग क्या बतिया रहे थे :
पहला :-भाई ,तुम्हारे मालिक ने ब्राड-बैन्ड ले लिया ..?
दूजा :- हाँ, कहता है कि इससे उसके बच्चे तरक्की करेंगें ?
पहला :-कैसे ,
दूजा :- जैसे हम लोग निरंतर तरक्की कर रहे हैं
पहला :-अच्छा,अपनी जैसी तरक्की
दूजा :- हाँ भाई वैसी ही ,उससे भी आगे
पहला :-यानी कि इस बार अपने को
दूजा :-अरे भाई आगे मत पूछना सब गड़बड़ हो जाएगा
पहला :-सो क्या तरक्की हुई तुम्हारे मालिक की
दूजा :- हाँ,हुई न अब वो मुझसे नहीं इंटरनेट के ज़रिए दूर तक के अपने भाई बन्दों से बात करता है। सुना हैकि वो परसाई जी से भी महान हो ने जा रहा है आजकल विश्व को व्यंग्य क्या है हास्य कहाँ है,ब्लॉग किसे कहतें हैं बता रहा है।
पहला :-कुछ समझ रहा हूँ किंतु इस में तरक्की की क्या बात हुई ?
दूजा :- तुम भी, रहे निरे इंसान के इंसान .........!!

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