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6 अप्रैल 2021

साहित्यकार दायित्व से कन्नी काट रहे हैं..!


#शुतुरमुर्ग_बुद्धिजीवियो, फूहड़ मंचीय कवियों, साहित्यकारों को चुनौती 
      सृजन धर्मियो चार दिनों से तुम सबके चेहरे साफ साफ देख रहा हूँ। बीजापुर सुकुमा में हिडमा ने 24 जवानों को शहीद कर दिया । तुम्हारी कलम की तेज धार किधर गई ?  शायद तुम्हारी कलम और चेतना दोनों नपुंसक हो गई है। प्रेमचंद कबीर तुलसी कराहते थे ! तुम हो कि-" नक्सलवाद के खिलाफ वातावरण नहीं बना सकते..?"
 हां चुनौती दे रहा हूं...!  जब मानवता सरेआम तार तार होती है तब तुम्हारी भूमिका क्या है..?
या तो तुम आयातित विचारधारा के गुलाम हो या अपने कंफर्ट जोन से बाहर ना निकलने की कसम खा चुके हो ?
  संस्कारधानी हो या मालवा बुंदेलखंड बघेलखंड बड़ी-बड़ी बातें करना मंच पर बैठकर फूहड़ चुटकुलों और गले बाजी करने वाले कवियों क्या बीजापुर तुम्हारे वतन का हिस्सा नहीं है ?
  तुम क्या जानो की दूर पहाड़ में रहने वाला आदिवासी कितने गुमराह किए जा रहे हैं। पढ़ते नहीं हो न और फिर तुम्हारी कलम में धार नहीं है और साथ ही साथ तुम एक विशिष्ट विचारधारा के षड्यंत्र को समझ नहीं पा रहे..! मेरी पोस्ट को पढ़ने के बाद या तो साहित्यकार होने का ऐलान मत करना या आईने के सामने खड़े होकर खुद को तमाचा मारना।
  - अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है लिखो उसके पहले पढ़ो ताकि समाज को समझ में आए कि यह देश किसी आयातित विचारधारा का गुलाम नहीं । 
सृजन और साहित्य की ठेकेदारी बंद करो समाज में सही दिशा देने के लिए साहित्यकार के रूप में राष्ट्र धर्म का पालन करो और यह नहीं कर सकते तो सृजन धर्मी होने का दावा मत करो आने वाली पीढ़ियां सब समझ जावेंगी आप क्या थे..! 

13 जून 2011

बिहार में पुलिसिया बर्बरता के लिये  जिम्मेदार व्यवस्था से ज़वाब लेकर हम क्या करेंगें हमारी पीड़ा तो यह कि इस देश में  
बर्बरता का बड़ता आकार न जाने कब हमारी आने वाली पीढ़ी को लील जाए, शायद हमको भी कौन जाने. भारत में इस मर्मांतक स्थिति के लिये हम ही ज़िम्मेदार हैं, भ्रष्टाचार पर आवाज़ उठाना "ठगी" साधारण अपराध की सज़ा सरे आम मौत 
और आतंक वाद की सज़ा नक्सल वाद की सज़ा ...??
क्या हो गया है इस देश को यहां कोई ऐसा राष्ट्रप्रेमी क्यों नहीं आगे आता जो देश  को सच्चा मार्ग सुझाए, क्या बिहार क्या अन्य प्रदेश  सभी जगह सर्वहारा यानी आख़िरी छोर वाला आम आदमी यूं ही तो मरता है. शायद वो वक्त दूर नहीं जब यह व्यवस्था स्वयमेव चरमरा के धाराशाई न हो जाए . सुधार लो भाई इस इंतज़ाम को 

20 मई 2008

टूटते दरकते संयुक्त परिवार

मित्रो ये एक सच घटना है। आज देर रात तो नहीं हुई थी , एक पैंतालीस वर्षीय बरस का व्यक्ति अपने सामूहिक परिवार में लौटा अपनी पत्नी के साथ लौटा तफरीह पर गए थे । दौनों बाज़ार में हल्का फुल्का चाट लेकर घर में आए बहन के बच्चों के लिए आइसक्रीम लेकर , घर के बच्चे भी अपने माँ-बाप की प्रतीक्षा में थे । घर पहुँचते ही बूड़े पिता की शह पर बडे भाई ने पत्नी के सामने उसे देर से का लाँछन लगाते हुए न केवल अपमानित किया बल्कि मारा भी। घर के मुखिया बूड़े व्यक्ति ने आग में घी डालने का काम किया । हिंसा होती रही । रिश्ते तार-तार होते रहे । जीत गया अंहकार,सत्ता , धन, का घमंड । हार गया अकिंचन स्नेह.....
संयुक्त परिवारों में होती इस प्रकार की हिंसाओं का अंत एकल परिवार की आधार शिला बनता है।इसी तरह टूटते हैं संयुक्त परिवार जो बचेखुचे हैं।
संयुक्त परिवारों की आधार शिला सम-भावों पे केन्द्रित है।
संयुक्त परिवार सिर्फ और सिर्फ इसी वजह से टूटतें हैं कि आर्थिक आधारों पर घर का बुजुर्ग बर्ताव करता है। समता के भावों का अंत होता है तो टूटन,दरकन स्वाभाविक है।
आप इस समस्या को सुलझाना चाहतें हैं अथवा संयुक्त परिवार के ढकोसलों से समाज को मुक्त कराना चाहेंगे . साथ ही मानवीय हिंसा पर आपकी क्या राय है......?

कितना असरदार

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