चिंतनकाल




आम आदमी के आक्रोष-बेचैनी में बेबसी , सवाल दागता पुण्य प्रसून बाजपेयी का ब्लॉग कुछ करने की सलाह दे रहा है किंतु सभी अभिमन्यु का ज़न्म अपने घर में होने देने से भयभीत सा हो जाता है। क्यों इस बात पर गंभीर ता से विचार ज़रूरी हो गया है। कोई बात नहीं अभिमन्यु का जन्म कहीं भी हो .... हो तो मेरा संकेत स्पष्ट है गर्भस्थ शिशु के आने के पूर्व आज का अर्जुन-रुपी पिता न तो आपनी पत्नी को चक्रव्यूह से निकालने का गुर नहीं सिखाते , वे केवल इस बात की चिंता करतें हैं की गर्भ में पल रहा भ्रूण किसका है...? कंहीं लड़की तो नहीं ..........?
उनको चिंता है बेटी न जन्मे अन्यथा वे भयावह चक्र व्यूह में फंस जाएंगे ...... उधर वही सब लोग जो व्यवस्था को चाय-पान ठेले पे गरियाते हैं चल पडतें हैं भ्रूण-परीक्षण कराने .....!
इन चिंता करने वाले वर्ग को एक बात समझनी ज़रूरी है की वे नेताओं को जितना भी गरिया लें लेकिन जब स्वार्थ सिद्ध करना हो रुके काम को गति दिलानी हो तो बिलकुल भगत से बन कर इन्हीं के सामने खड़े दिखाई देते हैं "जो जग पानी ...."
सच्ची समाज सेवा, लिंगानुपात ,बाल-विवाह,दहेज़,जैसे मुद्दों पे धनात्मक एवं सार्थक कोशिश को कहा जा सकता है। वर्ना
एक गीत आस का
एक नव प्रयास सा
गीत था अगीत था !
या कोई कयास था...?
जैसी स्थिति रहेगी
सुधि पाठको भारत में सामाजिक चैतन्य से जुड़े बिन्दुओं पर केवल ४-५ प्रतिशत , विमर्श होता है शेष समय हम सियासी बात चीत में अथवा छिद्रान्वेषण में खर्च करतें हैं।

8 टिप्‍पणियां:

  1. मुकुल जी आप का लेख बहुत ही सटीक हे, बाते तो हम बहुत करते हे, लेकिन अपनी बारी आने पर सभी नियम ताक पर रख देते हे.. यह बात आप की बिलकुल सही हे,

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  2. राज़ जी
    सादर-अभिवादन
    आत्म मंथन से आत्मा शुद्ध हो जाती है
    यानी की सिर्फ़ छिद्रान्वेषण करना,जीवन का
    लक्ष्य न होकर सत्यान्वेषण की दिशा में जाना
    ही बेहतर है.आप की त्वरित टिप्पणी ने मुझे
    आपका भक्त बना लिया
    आभार

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  3. चिंतनीय प्रश्न उठाया है, हम विचार करना होगा।

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  4. आज तो २०-२० का मैच था लगता ज़बरदस्त विषय
    दोनों ब्लॉग हंगामे दार बधाई
    इसे लेट पढा माफी चाहता हूँ

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  5. bahut jwalant prashn ko bade hi saargarbhit dhang se rakha hai aapne,par updesh kushal bahutere.....
    aapne meri rachna ko saraha ,khushi hui,par anya rachna ki tipanni anya par aa gai hai,aur ek spasht nahi tha,par aapka aana hi bahut mayne rakhta hai

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!