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7 फ़र॰ 2010

उड़न तश्तरी से रू ब रू : ब्लागिंग पर समीर लाल

मशहूर ब्लॉगर श्री समीर लाल जी से हुई बात चीत में ब्लागिंग को लेकर हुई चर्चा का पहला एपीसोड सादर प्रस्तुत है.समीर लाल जी का मत है कि हिंदी ब्लागिंग अपने उच्च मुकाम पर पहुंचेगी ये तयशुदा बात है .
समीर लाल जी से हुई बात चीत सुनिए नीचे  और  संवाद एवं विमर्श पर  भी


27 जन॰ 2010

हिंदी चिट्ठाकारिता :आत्म-चिंतन करना ज़रूरी है

मेरे पिछले  और मिसफिट पर शाया  इस आलेख  के बाद जो  भी स्थिति सामने आई उससे एक बात ती साफ़ हो गई कि वास्तव में ब्लॉग जगत भी कुंठा के सैलाब में उमड़-घुमड़ रहा है. और चटकों की दौड़ में सार्थक पोस्ट की जो दुर्दशा हो रही है उस से हिन्दी चिट्ठाकारिता को कोई लाभ नहीं बल्कि उसके पतन का मार्ग प्रशस्त हो रहा है. प्रिय और आदरणीय साथियो :-आपके मज़बूत कंधों  पे ब्लॉग जगत टिका है . और टिकी है गुरु-शिष्य परम्परा की भारतीय व्यवस्था. किन्तु कबीर की याद आते ही दृश्य एकदम  साफ़ हो जाता है और अपनी दशा हो जाती है नि:शब्द मन में शेष रह जाती है सिर्फ ये ध्वनियाँ : 'चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय '
जहां तक अनुभव शील व्यक्तित्वों की तलाश की बात है तो लगता है यह तलाश अंतर्जाल पे बंद कर देनी होगी मुझे, हर कोई हर किसी को ज्ञान और चुनौती देने में जुटा है  अगर यही ब्लागिंग है तो तज़ने योग्य है लेकिन तजिए मत हजूर !
@@अनूप जी ने कहा:-''झटकों में ऊर्जा होती है और उसका सदुपयोग किया जाना चाहिये। यह बात हमने भारतीय ब्लॉग मेला से मिले झटके के संदर्भ में कही थी जिसके बाद हमने चिट्ठाचर्चा शुरू की''
यानी किसी न किसी कारण से कोई न कोई सृजन हो ही जाता है यदि महाराज ने यह कह दिया तो बस अध्यात्म कह दिया इसके बाद कोई बात शेष नहीं रहती कि आने वाली पीढ़ी को बताया जावे कि ''हम तो कह रहे हैं कि चिट्ठाचर्चा,कॉम डोमेन का प्रयोग करके चर्चा करके बतायें छत्तीसगढ़ के साथी कि देखो ऐसे किया जाता है काम। खाली घोषणायें करने से क्या होता है भाई जी!' सुकुल जी आपने यह लिखने के पहले शायद सोच तो लिया होगा कि आपकी इस वाणी के कितने अर्थ निकलते हैं.
चित्र:India Chhattisgarh locator map.svgभारत के   मानचित्र गौर से देखिये विक्की पीडिया ने साफ़ साफ़ बताया कि यह भारत का ही हिस्सा है कोई बाहरी नहीं जहाँ तक मैं सोच रहा हूँ   वो हद है ब्लाग लेखन में संलग्न लोगों के आपसी रिश्ता यानी अपनापन और स्नेह जो भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर भी ज़रूरी है बाहर भी . होनी ही चाहिए वर्ना ज्ञान दत्त जी संजीत भाई के ब्लॉग आवारा बंजारा की पोस्ट पर सटीक कह गए:-'
ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...फिजिकल और वर्चुअल तौर पर अलग अलग चरित्र रखने वाले परेशान हों। हां यह जरूर है कि हिन्दी ब्लॉगजगत में बहसें कोई बहुत अच्छे स्तर की नहीं हैं।
बहुत संकुचन है। बहुत चिरकुटई।27/1/10 20:02
'
बड़ी गहरी बात है सभी को मानसिक हलचल हो जानी चाहिए यानि हिंदी चिट्ठाकारिता :आत्म-चिंतन करना ज़रूरी है
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27 जून 2009

अब तक अपन ने 1011 पोस्ट लिख मारी हैं



सभी भाइयो बहनों
सादर अभिवादन स्वीकारिये
आपको यह जान कर खुशी होगी की अपने राम ने एक हज़ार ग्यारह पोस्ट लिख कर कीर्तिमान बना लिया । मेरी कंपनी के कुल ७ हैं ।
  1. मुकुल का चिट्ठा : 101 संदेश
  2. मिसफिट 190 संदेश,
  3. "खज़ाना" : 348 संदेश
  4. उषा किरण : 203 संदेश
  5. नार्मदेय ब्राह्मण समाज, : 14 संदेश
  6. बावरे-फकीरा :: 118 संदेश
  7. मेलोडी ऑफ़ लाइफ : 38 संदेश
मुझे लगता है अब आप सभी अपनी अपनी पोस्ट गिन लीजिये । सुना हैं ब्लॉग गणना होने जा रही है.... फ़िर पोस्ट की गिनती और फ़िर टिपियाना भी गिना जाएगा. इस पर सूचना प्रकाशन विभाग एक विस्तृत रिपोर्ट भी छापने जा रहा है . जो ब्लॉगर एक लाख का आंकडा पार करेगा उनको "ब्लॉग श्री" की उपाधि दी जावेगी . समय का इंतज़ार कीजिए तब तक मेरी पीठ पर शुभकानाएं अंकित कर

दीजिए ।

23 मई 2009

" तुम साहिल वाले क्या जानो ...."

भाई विनोद कुमार पांडेयजी ,सादर अभिवादनयहाँ टिप्पणी के लिए । भाई एक मित्र ने अलाहाबाद से दोस्ती की हमसे आज बनारस से आप आए । मिलकर खुश हैं हम सभी ।
अंशु तिवारी के सवाल में नए ब्लॉगर का उछाह वहीं समीर जी ने सवाल किया तो मन में जबलईपुर वारो मित्रभाव दिखा . भाई विजय तिवारी इन दिनों बेहद व्यस्त हैं सो आप जान ही गए होंगे सो भाइयो ये वह सूची है जो जिसके सभी ब्लॉगर जबलपुरिया हैं . जब डूबे जी ने इस बात को जाना तो वे ज़हाज़ बनाने का सामान लेने गुरंदी मार्केट निकल पड़े. रहा संजू भैया का सवाल सो वे सदर से लगे केंट इलाके में रह रहे आर्मी आफिसर्स से इस बात की पता साजी के वास्ते निकल पड़े कि जबलपुर में बंदरगाह कैसे बनेगा.दिव्य नर्मदा वाले संजीव सलिल जी ने बताया की बंदर जहाँ भी होंगे अपनी आराम गाह बना लेंगे तब कहीं जाकर संजय तिवारी ’जी माने । साफ़ तौर पर ये तयशुदा है कि "बन्दर-गाह बरगी की उन पहाडियों में आसानी से बन सकतें हैं जहाँ बन्दर बहुतायत में हों "......... हों क्या हजूर हैं ही ।
आज फोन पर शैली बिटिया ने पूछा चिट्ठाजगत के मठाधीश !! कौन हैं और कैसे होते हैं...?
अपन भी लालबुझक्कड से बड़े वाले हैं बोल दिया-बेटे किसी ऐसे व्यक्ति को मठाधीश कहतें हैं जो मठे की दूकान चलातें हैं।
शैली जब संतोष कर लिया । अपने नाटक मंडली - वाले हिमांशु राय की सबसे ताज़ा पोष्ट 6 दिन बासी थी । इनको ईश्वर ने हवा में पोष्ट टांग देने का अनोखा वरदान दिया है तभी तो इनकी पोष्ट शीर्षक-विहीन होतीं हैं ।
"मल्लाहों को इल्जाम न दो तुम साहिल वाले क्या जानो "
ये तूफ़ान कौन उठाता है,ये कश्ती कौन डुबोता है॥ ['हफीज'जालंधरी]

24 अग॰ 2008

16 अग॰ 2008

चिंतनकाल




आम आदमी के आक्रोष-बेचैनी में बेबसी , सवाल दागता पुण्य प्रसून बाजपेयी का ब्लॉग कुछ करने की सलाह दे रहा है किंतु सभी अभिमन्यु का ज़न्म अपने घर में होने देने से भयभीत सा हो जाता है। क्यों इस बात पर गंभीर ता से विचार ज़रूरी हो गया है। कोई बात नहीं अभिमन्यु का जन्म कहीं भी हो .... हो तो मेरा संकेत स्पष्ट है गर्भस्थ शिशु के आने के पूर्व आज का अर्जुन-रुपी पिता न तो आपनी पत्नी को चक्रव्यूह से निकालने का गुर नहीं सिखाते , वे केवल इस बात की चिंता करतें हैं की गर्भ में पल रहा भ्रूण किसका है...? कंहीं लड़की तो नहीं ..........?
उनको चिंता है बेटी न जन्मे अन्यथा वे भयावह चक्र व्यूह में फंस जाएंगे ...... उधर वही सब लोग जो व्यवस्था को चाय-पान ठेले पे गरियाते हैं चल पडतें हैं भ्रूण-परीक्षण कराने .....!
इन चिंता करने वाले वर्ग को एक बात समझनी ज़रूरी है की वे नेताओं को जितना भी गरिया लें लेकिन जब स्वार्थ सिद्ध करना हो रुके काम को गति दिलानी हो तो बिलकुल भगत से बन कर इन्हीं के सामने खड़े दिखाई देते हैं "जो जग पानी ...."
सच्ची समाज सेवा, लिंगानुपात ,बाल-विवाह,दहेज़,जैसे मुद्दों पे धनात्मक एवं सार्थक कोशिश को कहा जा सकता है। वर्ना
एक गीत आस का
एक नव प्रयास सा
गीत था अगीत था !
या कोई कयास था...?
जैसी स्थिति रहेगी
सुधि पाठको भारत में सामाजिक चैतन्य से जुड़े बिन्दुओं पर केवल ४-५ प्रतिशत , विमर्श होता है शेष समय हम सियासी बात चीत में अथवा छिद्रान्वेषण में खर्च करतें हैं।

12 जुल॰ 2008

संगीत प्रेमियों कुछ कहना हो ब्लॉगर मीत से कह दीजिए

मीत

मीत जी का एतिहासिक ब्लॉग है इस ब्लॉग में वो सब कुछ है जो आज हम सब खोजते हैं । भारतीय संगीत को अन्तर जाल पे सजा कर समेकित करने वाले मीत जी यूनुस खान ,के पर्याय इस लिए नहीं कहे जा सकते की इन दौनों के बिना समेकन [एग्रीगेशन] कदाचित अधूरा होगा। सुर-संगीत से भरा मीत के ब्लॉग को पॉँच सितारा ब्लॉग कहा जा सकता है
अनिल बिस्वास (2)
अनुवाद (1)
अफ़शाँ (1)
अहमद फ़राज़ (1)
आबिदा (1)
आलम लोहार (1)
आशा भोसले (7)
इक़बाल बानो (3)
कबीर (1)
कवि प्रदीप (2)
क़व्वाली (1)
किशोर कुमार (3)
कुन्दन लाल सहगल (1)
कैफ़ी आज़मी (2)
गणेश बिहारी "तर्ज़' (1)
ग़ज़ल (16)
गाँधी (1)
गीता दत्त (1)
गुलज़ार (1)
गै़र फ़िल्मी गीत (24)
जगमोहन (1)
जयदेव (1)
जाँ निसार अख्तर (1)
जावेद अख्तर (1)
जिगर मुरादाबादी (1)
तलत महमूद (4)
दुष्यंत कुमार (2)
नीरज (1)
नुसरत फ़तह अली खा़न (2)
नूरजहाँ (1)
नैय्यरा नूर (1)
नज़्म (12)
पंकज मल्लिक (2)
फैज़ अहमद "फैज़" (3)
बस यूँ ही (7)
बेग़म अख़्तर (3)
भूले बिसरे गीत (12)
मदन मोहन (1)
मन्ना डे (5)
मास्टर मदन (2)
मीना कपूर (1)
मुकेश (1)
मुबारक़ बेग़म (1)
मुहम्मद रफ़ी (7)
मेरी आवाज़ में (22)
मेरी रचनायें (34)
रवि (1)
रामधारी सिंह "दिनकर" (7)
राशिद खा़न (1)
रौशन (3)
लता मंगेशकर (10)
शोभा गुर्टू (1)
सचिन देव बर्मन (1)
साहिर (5)
सी रामचंद्र (1)
सुदर्शन फ़ाकिर (1)
सुरेंदर कौर (1)
सुरैय्या (1)
हेमन्त कुमार (3)
होरी (1)
क़ता'त (7)
ग़ालिब (3)
फ़िल्मी गीत (32)

24 जून 2008

प्रभाकर पाण्डेय

शीर्षक नहीं बदलूँगा.....जालिमों प्रभाकर पाण्डेय की यह पोस्ट आज सबसे ज़ोरदार लगी
वे यहाँ तक कहते हैं कि
"जब सब 0 होता तो लेखक भी 0 होता और वह सीना तान के यह नहीं कह रहा होता की नहीं बदलूँगा, शीर्षक।
सोचिए जिम्मेदार कौन। इस चिट्ठे पर हमारे गणमान्य बुजुर्ग चिट्ठाकारों की एक भी टिप्पणी नहीं है जो इस बात की गवाह है कि उन लोगों ने इस शीर्षक को अहमियत ही नहीं दिया।
दोषी न शीर्षक है न जालिम दोस्तों, दोषी तो हम जालिम हैं।"
-प्रभाकर पाण्डेय
बधाइयाँ स्वीकारिए प्रभाकर जी

23 जून 2008

इस पोस्ट को कमज़ोर दिल वाले न पड़ें

रंजू ranju जी ने अमृता प्रीतम की याद में पोस्ट प्रकाशित कर जहाँ अभिभूत किया है । वहीं दूसरी ओर मुद्दत हुई है यार को मेहमां किये हुए पोस्ट भी असरदार है लेकिन मीत साहब कलकत्ता वालों के इस ब्लॉग किस से कहें ? पे पहुंचा तो दंग रह गया।किस से कहें ? ब्लॉग खजाना है अन्तर जाल पे लुटा रहे हैं अपने मीत जी इनकी जितनी तारीफ़ करुँ कम है ।। MANAS BHARADWAJ --THE LAST POEM IS THE LAST DESIRE ब्लॉग है मानस भारद्वाज का जो इंजीनियरिंग की पढाई में व्यस्त होकर भी पोस्ट करतें हैं एक कविता लगभग रोज़ ....!
कमज़ोर दिल वाले आत्म केंद्रित वायरस के शिकार , और जिनको दूसरों की तारीफ़ सुनने के लिए डाक्टर ने मना किया हो वे इस पोस्ट को कतई न बांचें ।

कितना असरदार

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