दोहा सलिला: भाई को भाई की, भाये कुछ बात..... संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

भाई को भाई की, भाये कुछ बात.....

संजीव 'सलिल'
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जो गिरीश मस्तक धरे, वही चन्द्र को मौन.
अमिय-गरल सम भाव से, करे ग्रहण है कौन?
महाकाल के उपासक, हम न बदलते काल.
व्याल-जाल को छिन्न कर, चलते अपनी चाल..
अनुज न मेरा कभी भी, होगा तनिक हताश.
अरिदल को फेंटे बना, निज हाथों का ताश..
मेघ न रवि को कभी भी, ढाँक सके हैं मीत.
अस्त-व्यस्त खुद हो गए, गरज-बरस हो भीत..
सलिल धार को कब कहें, रोक सकी चट्टान?
रेत बनी, बिखरी, बही, रौंद रहा इंसान..
बाधाएँ पग चूम कर, हो जायेंगी दूर.
मित्रों की पहचान का, अवसर है भरपूर..
माँ सरस्वती शक्ति-श्री का अपूर्व भण्डार.
सदा शांत रह, सृजन ही उनका है आचार..
कायर उन्हें  न मानिये, कर सकती हैं नाश.
काट नहीं उनकी कहीं, डरे काल का पाश..
शब्द-साधना पथिक हम, रहें हमेशा शांत.
निबल न हमको समझ ले, कोई होकर भ्रांत..
सृजन साध्य जिसको 'सलिल', नाश न उसकी चाह.
विवश करे यदि समय तो, सहज चले उस राह..
चन्द्र-चन्द्रिका का नहीं, कुछ कर सका कलंक.
शरत-निशा कहती यही, सत्य सदा अकलंक..
वर्षा-जल की मलिनता, से न नर्मदा भीत.
अमल-विमल-निर्मल बाहें, नमन करे जग मीत..
यह साँसों की धार है, आसों का सिंगार.
कीर्ति-कथा ही अंत में, शेष रहे अविकार..
जितने कंटक-कष्ट में, खिलता जीवन-फूल.
गौरव हो उतना अधिक, कोई न सकता भूल..
हम भी झेलें विपद को, धरे अधर-मुस्कान.
तिमिर-निशा को दिवाली, करते चतुर सुजान..
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े भैया ने यह पोस्ट मेरी मानसिक तनाव भरी वर्तमान स्थिति को देख कर ताज़ा ताज़ा लिखी और पोस्ट की. मित्रो मैं एक गम्भीर तनाव को भोग रहा हूं.और ऐसे नैतिक बल की ज़रूरत मुझे है

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  2. "भारत ब्रिगेड" को मानसिक तनाव---रुक नहीं सकता...

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  3. सृजन साध्य जिसको 'सलिल', नाश न उसकी चाह.
    विवश करे यदि समय तो, सहज चले उस राह..
    यह साँसों की धार है, आसों का सिंगार.
    कीर्ति-कथा ही अंत में, शेष रहे अविकार..
    जितने कंटक-कष्ट में, खिलता जीवन-फूल.
    गौरव हो उतना अधिक, कोई न सकता भूल..
    हम भी झेलें विपद को, धरे अधर-मुस्कान.
    तिमिर-निशा को दिवाली, करते चतुर सुजान..
    आचार्य जी की यह पोस्ट हर पाठक को अद्भुत आत्मबल प्रदान कर रही है ..........जब इतने स्नेह करने वालों का साथ बना है तो बड़ा से बड़ा तनाव भी घट जाएगा .....अपनो के प्रेम और आशीष से घोर संकट के क्षण भी कट ही जाते है भाईसाब ...निश्चित तौर पर जल्द ही इस तनाव पर विजय प्राप्त करेंगे ...मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है .
    ऐसी अनुपम रचना पर वारी जाऊं .....बहुत बहुत आभार !

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!