बाल कविता:
आन्या गुडिया प्यारी
संजीव 'सलिल'
*
*
आन्या गुडिया प्यारी,
सब बच्चों से न्यारी।
गुड्डा जो मन भाया,
उससे हाथ मिलाया।
हटा दिया मम्मी ने,
तब दिल था भर आया ।
आन्या रोई-मचली,
मम्मी थी कुछ पिघली।
नया खिलौना ले लो,
आन्या को समझाया ।
आन्या बात न माने,
मन में जिद थी ठाने ।
लगी बहाने आँसू,
सिर पर गगन उठाया ।
आये नानी-नाना,
किया न कोई बहाना ।
मम्मी को समझाया
गुड्डा वही मंगाया ।
मम्मी ने ले धागा ,
कार में गुड्डा टाँगा ।
आन्या झूमी-नाची,
गुड्डा भी मुस्काया ।
फिर महकी फुलवारी,
आन्या गुडिया प्यारी।
मयकदा पास हैं पर बंदिश हैं ही कुछ ऐसी ..... मयकश बादशा है और हम सब दिलजले हैं !!
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3 जुल॰ 2010
31 मार्च 2010
काव्य रचना: मुस्कान --संजीव 'सलिल'
काव्य रचना:
मुस्कान
संजीव 'सलिल'
जिस चेहरे पर हो मुस्कान,
वह लगता हमको रस-खान..
अधर हँसें तो लगता है-
हैं रस-लीन किशन भगवान..
आँखें हँसती तो दिखते -
उनमें छिपे राम गुणवान..
उमा, रमा, शारदा लगें
रस-निधि कोई नहीं अनजान..
'सलिल' रस कलश है जीवन
सुख देकर बन जा इंसान..
*************************
मुस्कान
संजीव 'सलिल'
जिस चेहरे पर हो मुस्कान,
वह लगता हमको रस-खान..
अधर हँसें तो लगता है-
हैं रस-लीन किशन भगवान..
आँखें हँसती तो दिखते -
उनमें छिपे राम गुणवान..
उमा, रमा, शारदा लगें
रस-निधि कोई नहीं अनजान..
'सलिल' रस कलश है जीवन
सुख देकर बन जा इंसान..
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