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5 सित॰ 2010

मुक्तिका: शतदल खिले.. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

शतदल खिले..

संजीव 'सलिल'

*
*
प्रियतम मिले.
शतदल खिले..

खंडहर हुए
संयम किले..

बिसरे सभी
शिकवे-गिले..

जनतंत्र के
लब क्यों सिले?

भटके हुए
हैं काफिले..

कस्बे कहें
खुद को जिले..

छूने चले
पग मंजिलें..

तन तो कुशल
पर मन छिले..

*************

कितना असरदार

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