अपनी शक्ति के अनुप्रयोग से दूर

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तुम जो सरकारें बनाते हो
तुम जो सरकारें सजाते हो
तुम जो जनतंत्र हो
कोई अपराधी नहीं
तो फिर क्यों
अपनी शक्ति के
अनुप्रयोग से दूर थे
तुम्हारा यही निठ्ल्ला-पन
तुमको एक बार फिर गुलाम
बना सकता है
जैसे अभी भी हो
आयातित विचारों के गुलाम
  • गिरीश बिल्लोरे"मुकुल"
आराम के इस दौर में कोई न दखल दे
नींद न तोडे भले सब कुछ वो मसल दे
{लिंक नोट पेड़ से साभार }

3 टिप्‍पणियां:

  1. जैसे अभी भी हो
    आयातित विचारों के गुलाम

    --हम्म!!

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  2. yah shakti kaa anuprayog bhee to --aayaatit vichaar hee hai?
    ------------kyaa kahanaa hai????????

    उत्तर देंहटाएं

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!