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25 अक्टू॰ 2012

माहिया गीत मौसम के कानों में --संजीव 'सलिल'

माहिया गीत   
मौसम के कानों में
संजीव 'सलिल'
*
 
* 
मौसम के कानों में
कोयलिया बोले,
खेतों-खलिहानों में।
*
आओ! अमराई से
 
आज मिल लो गले, 
भाई और माई से।
*
आमों के दानों में,
गर्मी रस घोले,
बागों-बागानों में---
*
होरी, गारी, फगुआ
गाता है फागुन,
बच्चा, बब्बा, अगुआ।
*
 
प्राणों में, गानों में,
मस्ती है छाई,
दाना-नादानों में---
*

Acharya Sanjiv verma 'Salil'
सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

10 नव॰ 2009

तेवरी : मार हथौडा, तोड़ो मूरत. --संजीव 'सलिल'

मार हथौडा, तोड़ो मूरत.
बदलेगी तब ही यह सूरत..

जिसे रहनुमा माना हमने
करी देश की उसने दुर्गत..

आरक्षित हैं कौए-बगुले
कोयल-राजहंस हैं रुखसत..

तिया सती पर हम रसिया हों.
मन पाले क्यों कुत्सित चाहत?.

खो शहरों की चकाचौंध में
किया गाँव का बेड़ा गारत..

क्षणजीवी सुख मोह रहा है.
रुचे न शाश्वत-दिव्य विरासत..

चलभाषों की चलाचली है.
'सलिल' न कासिद और नहीं ख़त..

************

5 नव॰ 2009

तेवरी: मार हथौडा, तोड़ो मूरत. -आचार्य संजीव 'सलिल'

तेवरी

आचार्य संजीव 'सलिल'

मार हथौडा, तोड़ो मूरत.
बदलेगी तब ही यह सूरत..

जिसे रहनुमा मन हमने
करी देश की उसने दुर्गत..

आरक्षित हैं कौए-बगुले
कोयल-राजहंस हैं रुखसत..

तिया सती पर हम रसिया हों.
मन पाले क्यों कुत्सित चाहत?.

खो शहरों की चकाचौंध में
किया गाँव का बेड़ा गारत..

क्षणजीवी सुख मोह रहा है.
रुचे न शाश्वत-दिव्य विरासत..

चलभाषों की चलाचली है.
'सलिल' न कासिद और नहीं ख़त..

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