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6 फ़र॰ 2013

अभिनव प्रयोग- उल्लाला गीत: जीवन सुख का धाम है संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग-
उल्लाला गीत:
जीवन सुख का धाम है
संजीव 'सलिल'

*
जीवन सुख का धाम है,
ऊषा-साँझ ललाम है.
कभी छाँह शीतल रहा-
कभी धूप अविराम है...*
दर्पण निर्मल नीर सा,
वारिद, गगन, समीर सा,
प्रेमी युवा अधीर सा-
हर्ष, उदासी, पीर सा.
हरी का नाम अनाम है
जीवन सुख का धाम है...
*
बाँका राँझा-हीर सा,
बुद्ध-सुजाता-खीर सा,
हर उर-वेधी तीर सा-
बृज के चपल अहीर सा.
अनुरागी निष्काम है
जीवन सुख का धाम है...
*
वागी आलमगीर सा,
तुलसी की मंजीर सा,
संयम की प्राचीर सा-
राई, फाग, कबीर सा.
स्नेह-'सलिल' गुमनाम है
जीवन सुख का धाम है...
***

26 जन॰ 2013

गणतंत्र दिवस, गीत: संजीव 'सलिल'

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत: 

 


 




लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर 

संजीव 'सलिल'

*
लोकतंत्र की वर्ष गांठ पर
भारत माता का वंदन...

हम सब माता की संतानें,
नभ पर ध्वज फहराएंगे.
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
'जन गण मन' गुन्जायेंगे.
'झंडा ऊंचा रहे हमारा',
'वन्दे मातरम' गायेंगे.
वीर शहीदों के माथे पर
शोभित हो अक्षत-चन्दन...

नेता नहीं, नागरिक बनकर
करें देश का नव निर्माण.
लगन-परिश्रम, त्याग-समर्पण,
पत्थर में भी फूंकें प्राण.
खेत-कारखाने, मन-मन्दिर,
स्नेह भाव से हों संप्राण.
स्नेह-'सलिल' से मरुथल में भी
हरिया दें हम नन्दन वन... 

दूर करेंगे भेद-भाव मिल,
सबको अवसर मिलें समान.
शीघ्र और सस्ता होगा अब
सतत न्याय का सच्चा दान.
जो भी दुश्मन है भारत का
पहुंचा देंगे उसे मसान.
सारी दुनिया लोहा मने
विश्व-शांति का हो मंचन...

***

Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com

21 जन॰ 2013

मुक्तक : रूप की आरती संजीव 'सलिल'

मुक्तक

रूप की आरती
संजीव 'सलिल'
*
रूप की आरती उतारा कर.
हुस्न को इश्क से पुकारा कर.
चुम्बनी तिल लगा दे गालों पर-
तब 'सलिल' मौन हो निहारा कर..
*
रूप होता अरूप मानो भी..
झील में गगन देख जानो भी.
देख पाओगे झलक ईश्वर की-
मन में संकल्प 'सलिल' ठानो भी..
*
नैन ने रूप जब निहारा है,
सारी दुनिया को तब बिसारा है.
जग कहे वन्दना तुम्हारी थी-
मैंने परमात्म को गुहारा है..
*
झील में कमल खिल रहा कैसे.
रूप को रूप मिल रहा जैसे.
ब्रम्ह की अर्चना करे अक्षर-
प्रीत से मीत मिल रहा ऐसे..
*
दीप माटी से जो बनाता है,
स्वेद-कण भी 'सलिल' मिलाता है.
श्रेय श्रम को मिले  दिवाली का-
गौड़ धन जो दिया जलाता है.
*
भाव में डूब गया है अक्षर,
रूप है सामने भले नश्वर.
चाव से डूबकर समझ पाया-
रूप ही है अरूप अविनश्वर..
*
हुस्न को क्यों कहा कहो माया?
ब्रम्ह को क्या नहीं यही भाया?
इश्क है अर्चना न सच भूलो-
छिपा माशूक में वही पाया..
*

16 जन॰ 2013

गीत: आओ! आँख मिचौली खेलें... संजीव 'सलिल'

चित्र पर कविता रचें:



गीत:
आओ! आँख मिचौली खेलें...
संजीव 'सलिल'
*
जीवन की आपाधापी में,
बहुत थक गए, ऊब गए हम।
भूल हँसी, मस्ती, खुशियों को,
व्यर्थ फ़िक्र में डूब गए हम।
छोड़ें सारा काम, चलो अब
और न हम बेबस तन ठेलें,
आओ! आँख मिचौली खेलें...
*
टीप-रेस, कन्ना-कौड़ी हो,
कंचे, चीटी-धप मत भूलें।
चढ़ें पेड़ पर झूला डालें,
ऊंची पेंग बढ़ा नभ छू लें।
बात और की भी  मानें कुछ,
सिर्फ न अपनी अपनी पेलें-
आओ! आँख मिचौली खेलें...
*
मिस्टर-मिसेज, न अंकल-आंटी,
गुइयाँ, साथी, सखा, सहेली।
भूलें मैनर, हाय-हलो भी- 
पूछें-बूझें मचल पहेली।
सुना चुटकुले, लगा ठहाके,
भुज-पाशों में कसकर लेलें -
आओ! आँख मिचौली खेलें...
*

25 अक्टू॰ 2012

माहिया गीत मौसम के कानों में --संजीव 'सलिल'

माहिया गीत   
मौसम के कानों में
संजीव 'सलिल'
*
 
* 
मौसम के कानों में
कोयलिया बोले,
खेतों-खलिहानों में।
*
आओ! अमराई से
 
आज मिल लो गले, 
भाई और माई से।
*
आमों के दानों में,
गर्मी रस घोले,
बागों-बागानों में---
*
होरी, गारी, फगुआ
गाता है फागुन,
बच्चा, बब्बा, अगुआ।
*
 
प्राणों में, गानों में,
मस्ती है छाई,
दाना-नादानों में---
*

Acharya Sanjiv verma 'Salil'
सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

कृति चर्चा:आम आदमी के दर्द के आलेख : सुमित्र के व्यंग्य लेख संजीव 'सलिल'


कृति चर्चा:

चर्चाकार: संजीव 'सलिल'

 
      

आम आदमी के  दर्द के आलेख : सुमित्र के व्यंग्य लेख
*
व्यंग्य लेखन साहित्य की वह विधा है जो कालखंड विशेष की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पारिवारिक तथा वैयक्तिक विडम्बनाओं, विसंगतियों, अंतर्द्वंदों व आडम्बरों के त्रासद-हास्यद पक्षों को उद्घाटित कर दोगलेपन तथा पाखंड पर सीधा, तीखा किन्तु विनोदपूर्ण प्रहार करती है. व्यंग्य कभी व्यष्टि, कभी समष्टि, के माध्यम से परिस्थितियों, प्रणालियों, व्यवस्थाओं आदि पर शब्द-प्रहार कर भ्रष्टाचार, घृणा, शोषण, द्वेष, लोलुपता, स्वार्थपरता, कठमुल्लापन आदि को सामने लाता है किन्तु धर्मोपदेशक की तरह तजने का आग्रह  नहीं करता. व्यंग्य-लेखन का उद्देश्य पाठक के मन में गलत के प्रति वितृष्णा पैदा करना होता है, अंतर्मन में विरोध का भाव उत्पन्न करना होता है.

संस्कारधानी जबलपुर व्यंग्य को 'स्पिरिट' कहनेवाले किन्तु अपने प्रचुर और प्रभावी लेखन से हिंदी साहित्य में स्वतंत्र विधा का स्थान दिलानेवाले स्वनामधन्य व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कर्मस्थली है. तुलसी के पौधे से भूमि पर गिरी मंजरियों से अनेक अंकुर प्रस्फुटित-पल्लवित होना स्वाभाविक है. परसाई की व्यंग्य लेखन मंजरी से संस्कारधानी में अंकुरित व्यंग्यकारों में सुमित्र चर्चित रहे हैं. परसाई जी के सान्निन्ध्य में समाज को सजग दृष्टि से निरखने-परखने का संस्कार पाकर विद्रूपताओं और विसंगतियों से व्यथित होने वाला तरुण पत्रकार सुमित्र उन्हें ललकारकर पटकनी देनेवाले व्यंग्यकार सुमित्र में कब-कैसे परिवर्तित हो गया संभवतः उसे भी पता नहीं चला. तभी तो दैनिक अख़बार के स्तम्भ के सीमित कलेवर में वह आम आदमी की व्यथा-कथा कहने का साहस जुटाकर कम शब्दों में गहरी बात कह सका.

इस संकलन के व्यंग्य लेखों में व्यापक अनुभव क्षेत्र की खोज, सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की प्रवृत्ति, दूर दृष्टि संपन्न सकारात्मक परिवर्तन की दिशा अन्तर्निहित है. सुमित्र जी के व्यंग्य तिलमिलाते नहीं सहलाते हैं. प्रसाद गुण संपन्न सांकेतिक अर्थ व्यंजना सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक बनकर पाठकों को आत्मावलोकन ही नहीं आत्मालोचन के लिये भी प्रेरित करती है. बँट रहा है भारत रत्न, महान जी, आप कतार में हैं, निंदक नियरे राखिए, नंगा और नंगपन, सूत न कपास, नमामि देवी चापलूसी-चुगलखोरी, बजट की वंशी, अथ मुगालता कथा, पढ़ो, बढ़ो और गिर पड़ो, आदि ३० व्यन्ग्य७अ लेख सुमित्र जी के सामाजिक सरोकारों. सरोकारों के प्रति संवेदनशील सजग दृष्टि तथा दृष्टिजनित सरोकारों का ऐसा वर्तुल निर्मित करते हैं जिसके केंद्र में आम आदमी की विवशता तथा जिजीविषा दोनों की सहभागिता संभव हो पाती है.

सुमित्र जी कि सहज चुटीली भाषा पाठक के मन को स्पर्श करती है- ' अब तो दुनिया ही बदल गई, पहले जैसे सरोवर अब कहाँ? पनिहारिनों का पनघट पर लगा वह स्वर्गीय मेला. सब स्वर्गीय हो गया. अब क्या है? केंचुए से नल देखो, नल की धार देखो और झोंटा छितराती नायिकाएं देखो. श्रृंगार का तो फट्टा ही साफ़ समझो. तुम कहोगे हम रो रहे हैं. क्यों न रोएँ? तुम्हारे समय में चार महीनों का ताप काफी गुल खिलाता था. काफी ऊर्जा दे जाता था. चंदन की काफी खपत हो जाती थी और चार माह के बाद में जब मेघराजाअपनी प्रेम-फुहार से धरती को सिंचित करते थे तो 'परिरंभ कुंभ' की मदिरा की छटा छिटक जाती थी. इधर तो साल भर से मेघों का गुरिल्लावार चालू है. पानी थामा ही नहीं, गया ही नहीं, और आज आषाढ़स्य प्रथम दिवसे. न धरती सूनी है, न उसके सिंचन से सौंधी गंध उठ रही है. अब आगे क्या होगा? संयोग-वियोग श्रृंगार की सभी संभावनाएं धूमिल हैं.''

प्रसिद्ध लेखिका एम. डब्ल्यू. मोंतेंग्यू के अनुसार: 'व्यंग्य एक तेज़ धार चाकू के समान है जो इस प्रकार घाव करता है कि स्पर्श तक का आभास भी  नहीं हो.' डॉ. सुमित्र की संवेदनशील परिपक्व सोच और भाषिक सामर्थ्य चाकू कवर को गुलाब के रेशमी स्पर्श में बदल देता है.
______
 

30 मई 2012

दोहा गीत: नन्हें पर... --संजीव 'सलिल'

दोहा गीत:
नन्हें पर...
संजीव 'सलिल'
*

*
नन्हें पर र्हौसला है,
तेरा विहग विशाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*
रवि किरणें टेरें तुझें, खोल देखकर आँख.
कर दे आलस दूर- उठ, लग न जाए फिर आँख..

बाधा से टकरा पुलक, घूर मिलाकर आँख.
संकट-कंटक दूर हों, आप मिलाकर आँख..

कर प्रयास ऊँचा रहे,
तेरा मस्तक-भाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*
भाग्य देव को मना ले, मिला आँख से आँख.
प्रियतम को प्रिय- डाल दे, जो आँखों में आँख..

पग-पग बढ़ सपने अगिन, रहे बसाये आँख.
तौल परों को- विफल हो, डबडबाये ना आँख..

श्रम-गंगा में स्नान कर,
मत प्रयास को टाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*
सपने सच कर मुस्कुरा, भर-भर आये आँख.
गिर-उठ-बढ़ स्वागत करे, नगमे गाये आँख..

अपनी नजर उतर ले राई-नौंन ले आँख.
खुद को सब पर वार दे, जग उजार दे आँख..

हो विनम्र पा सफलता,
कर कुछ 'सलिल' कमाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.in
http://hindihindi.in.divyanarmada

27 मई 2012

गीत: छोड़ दें थोड़ा... संजीव 'सलिल'


गीत:
छोड़ दें थोड़ा...
संजीव 'सलिल'
*
जोड़ा बहुत,
छोड़ दें थोड़ा...
*
चार कमाना, एक बाँटना.
जो बेहतर हो वही छांटना-
म्न्झ्धारों-भँवरों से बचना-
छूट न जाए घाट-बाट ना.
यही सिखाया परंपरा ने
जुत तांगें में
बनकर घोड़ा...
*
जब-जब अंतर्मुखी हुए हो.
तब एकाकी दुखी हुए हो.
मायावी दुनिया का यह सच-
आध्यात्मिक कर त्याग सुखी हो.
पाठ पढ़ाया पराsपरा ने.
कुंभकार ने
रच-घट फोड़ा...
*
मेघाच्छादित आसमान सच.
सूर्य छिपा पर भासमान सच.
छतरीवाला प्रगट, न दिखता.
रजनी कहती है विहान सच.
फूल धूल में भी खिल हँसता-
खाता शूल
समय से कोड़ा...
***
Acharya Sanjiv verma 'Salil'

http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

31 अक्टू॰ 2009

नवगीत: फेंक अबीर, gaaoसंजीव 'सलिल'

आज की रचना:

नवगीत

संजीव 'सलिल'

फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...

*

भूलो भी तहजीब
विवश हो मुस्काने की.
देख पराया दर्द,
छिपा मुँह हर्षाने की.

घिसे-पिटे
जुमलों का
माया-जाल समेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...

*

फुला फेंफड़ा
अट्टहास से
गगन गुंजा दो.
बैर-परायेपन की
बंजर धरा कँपा दो.

निजता का
हर ताना-बाना
तोड़-लपेटो.
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...

*

बैठ चौंतरे पर
गाओ कजरी
दे ताली.
कोई पडोसन भौजी हो,
कोई हो साली.

फूहड़ दूरदर्शनी रिश्ते
'सलिल' न फेंटो. .
फेंक अबीरा,
गाओ कबीरा,
भुज भर भेंटो...

*

30 अक्टू॰ 2009

नवगीत: पीले पत्तों की/पौ बारह, संजीव 'सलिल'

आज का गीत:

संजीव 'सलिल'

पीले पत्तों की
पौ बारह,
हरियाली रोती...
*
समय चक्र
बेढब आया है,
मग ने
पग को
भटकाया है.
हार तिमिर के हाथ
ज्योत्सना
निज धीरज खोती...
*
नहीं आदमी
पद प्रधान है.
हावी शर पर
अब कमान है.
गजब!
हताशा ही
आशा की फसल
मिली बोती...
*
जुही-चमेली पर
कैक्टस ने
आरक्षण पाया.
सद्गुण को
दुर्गुण ने
जब चाहा
तब बिकवाया.
कंकर को
सहेजकर हमने
फेंक दिए मोती...
*

दोहा सलिला संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला

संजीव 'सलिल'

मन वृन्दावन में बसे, राधा-माधव नित्य.

श्वास-आस जग जानता, होती रास अनित्य..

प्यास रहे बाकी सदा, हास न बचता शेष.

तिनका-तिनका जोड़कर, जोड़ा नीड़ अशेष..

कौन किसी का है सगा?, और कौन है गैर?

'सलिल' मानते हैं सभी, अपनी-अपनी खैर..

आए हैं तो छोड़ दें, अपनी भी कुछ छाप.

समय पृष्ठ पर कर सकें, निज हस्ताक्षर आप..

धूप-छाँव सा शुभ-अशुभ, कभी न छोडे साथ.

जो दोनों को सह सके, जिए उठाकर माथ..

आत्म-दीप बालें 'सलिल', बन जाएँ विश्वात्म.

मानव बनने के लिए, आये खुद परमात्म..

सकल जगत से तिमिर हर, प्रसरित करें प्रकाश.

शब्द ब्रम्ह के उपासक, जीतें मन-आकाश..

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