मेरे शहर की शिलाए कोमल

है मेरी माटी की भीनी खुशबू
मेरे शहर की शिलाए कोमल
जो इस को पाए वो इसको गाए
इधर का मंजर न होता ओझल
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न भूल पाया हूँ तंग गलियाँ
जहां है चौड़े दिलों के आँगन
जहाँ सभी को सभी ने जाना
शहर जबलपुर विशाल दरपन
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यहीं कबीरा सिखाने आया
यही कहीं से उठा था ओशो
इसे थी ताक़त नूर ने दी
जी हाँ सुभद्रा ! किरण थी वो तो
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यहीं से ज्ञान रंजित पहल उठी थी
यहीं से पीतल का घोड़ा दौडा
यही से अमृत ने पूजी रेवा
यहीं मिलन का फलक था चौड़ा
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यहीं मुकुल ने सपन सजाए
यहीं सुरों के सजा दूं मेले
सहर जबलपुर की तासीर देखो
न तुम अकेले न मैं अकेला
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एक स्वप्न सुन्दरी की कहानी :


गाल पे काला तिल था उसके। याद है सफ़ेद झक्क गोया मैदे से बनाई गयी हो . आशिकी के लिए इत्ता काफ़ी था मुहल्ले के लड़कों के लिए दिन भर घर में बैठी उस सुकन्या को मोहल्ले में आए पन्द्रह-बीस दिन ही हुए थे की सारे मुहल्ले के लोग खासकर ख़बर खोजी औरतें, ताज़ा ताज़ा मुछल्ले हुए वे लडके जो दस के आगे बस न पड़ सके न पड़ना ही चाहते थे.क्योंकि माँ-बाप की सामर्थ्य नहीं का लेबल लगा कर स्कूल न जाना ही उनका अन्तिम लक्ष्य था...... ताकि उनकी आन बान बची रहे , सुबह सकारे उठाना उनके मासिक कार्यक्रम में था यानी महीने में एकाध बार ही अल्ल-सुबह जागते थे.वरना ९ से पहले उनके पिता जी भी जगा न सकते थे. यानी कुलमिला कर बोझ घर में पिता पर बाहर लड़कियों पर.क्या मजाल की मुहल्ले की कोई लड़की इनके नामकरण यानी फब्तियों से बच जाए .अगर भूरी राजू से बचे तो कंजा राजू की फब्तियों का शिकार हो ही जातीं थी बेचारी . कंजा,भूरी,कंटर, तीन राजुओं के अलावा बिल्लू.मोंटी,गोखी,कल्लन,सुरेन,ये सारे के सारे कैरेक्टर मुहल्ले की फिजा में समकालीन पसंदीदा हीरोज़ की स्टाइल में रहा करते थे उस मोहल्ले में जहाँ कभी हम रहा रहे थे. ,
हाँ तो वो सुंदर लड़की को निहारने कितने जतन करते थे ये लडके . किंतु वो सफ़ेद झक गाल पर तिल वाली लड़की उनको देखने कम ही मिलती और जिसने उस लावण्या का दर्शन कर लिया तो समझिये कि दिन भर अन्य सारे लडके उसे घेर के खूबसूरती का विवरण पूछते.
काय...? आज तो .....
हओ... आज तलक हम नई देखी ऐसी लड़की ! बड्डा गज़ब है... रेखा को बिठा दो बाजू में तो रेखा फीकी पड़ जाहै...!
अरे घर से बाहर काय नई आती...?
"अरे,सुन्दरता पे डाका न डाल दें अरे तुम तो यार लड़की का तुमाए साथ कंचा खेलेगी कि पतंग उड़ाएगी बेबकूफ हो तुम इत्ती सी बात नई समझते "
तभी कंटर राजू बड़े स्टाइल से बोला :"सुनो रे अदब से बात करो तुमाई सबकी भाभी है साले अब कोई बोला तो...?"
तो क्या .......... बताएं का कित्ती लड़कियों को हमे भाभी बनाएगा साले....पटती एको नई बात तो सुनो शेख चिल्ली की साला आइना देख घर जाके
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रहस्यमयी उस सुकन्या को कितने लडके अपनी प्रेयसी मान बैठे थे .कोई गुरूवार उपासा रहने लगा था तो किसी ने ग्वारीघाट वाले हनुमान-मन्दिर में अर्जी तक दाखिल कर दी थी .कुल मिला कर अभीष्ट की सिद्धी के लिए इष्ट को सिद्ध कराने का ज्ञान सबके अंतर्मन में उपजाने लगा. उस लड़की के मुहल्ले में आते ही अन्य लड़कियों पर फब्तियां भी यदा कदा ही कसी जातीं थी. . सबका अन्तिम लक्ष्य "गाल पर काले तिल वाली लड़की को इम्प्रेस करना था "अब दीपा,माया,मीरा,मौसमी सब महत्त्व हीन हो गयीं थी
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होते करते आठ माह बीत गए एक दिन अचानक वो लड़की कहाँ गयी लडके इस सवाल को लेकर बेचैन अधीर हो रहे थे . कंजा राजू से रहा नहीं गया उस सुकन्या की माँ से पूछ ही लिया : "अम्मा जी, आप अकेलीं है बाबूजी .... इससे पहले कि कंजा बेटी के बारे में पूछता कि अम्मा जी की तनी भ्रकुटी देख अपना सा मुंह लिए गली पकड़ ली .
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दो साल बाद होली की हुडदंग में मोहल्ले के दस बारह लडके पुलिस के हत्थे चढ़ गए किसी के माँ बाप जमानत को आए तब सिपाही सबको हथकड़ी लगा के कलेक्ट्रेट के कमरा न 56 में पेश करने ले आया . रीडर ने जमानत पेपर की दरयाफ्त की . सबके चेहरों से हवाइयां उड़ रहीं थी कि सब डिविज़नल मजिस्ट्रेट की सुरीली आवाज़ ने उनको चौंका दिया "बाबू, साब इनकी जमानत मैं लेती हूँ "
साहिबा का कथन सुन युवक सन्न रह गए . एस डी एम मैडम की कृपा की उनको उम्मीद इस कारण भी न थी क्योंकि वही सुकन्या थी जिसके लिए कई जतन करते थे ये लडके .
रिहा होने पर भी लडके कमरे के सामने सर झुकाए खड़े थे .... मैडम जब निकलीं तो उनको भी ताज्जुब हुआ . एक क्षण रुक कर बोली : "अपना मार्ग तपस्या से बनता है न कि सपनों में खे रह कर ...! उस वक़्त मैं इसी परिक्षा की तैयारी कर रही थी . तुम्हारी राहें अभी बंद नहीं हुईं हैं अभी भी रास्ते खुलें हैं

बावरे-फकीरा लांचिंग अवसर पर: सादर-आमंत्रण.....!!

In the memory of

Late Savyasachi Mrs. Pramila Billore

Savysachi ,Group Jabalpur

Presents:

Baware-Faqeera

Singer: Aabhas Joshi, Sandeepa Music:Shreyash Joshi

Lyricist: Girish Billore”Mukul”, Studio: Swar-Darpan



Respected

Sir/Madam,

Om-Sai-Ram
With due respect . This is to bring to your notice that we are launching album “Baware-Faqira” (sung by mesmerizing singer Aabhas Joshi) on 14 MARCH 2009 at 07:30 at Manas-Bhavan , Jabalpur . in presence of Abhas Joshi
This is to bring to your notice that profit earned through this album will be given to District Administration Jabalpur for making arrangement of Lifeline Express.
Health services provider for remote areas of India

You are cordially invited for the event

Girish Billore “Mukul”

Lyricist & producer (Hon.)


प्रायोजक चाहिए


In the memory of

Late Savyasachi Mrs. Pramila Billore

Girish Billore ‘Mukul’

Presents: Baware-Faqeera

Singer: Aabhas Joshi, Sandeepa Music:Shreyash Joshi

Lyricist: Girish Billore”Mukul”, Studio: Swar-Darpan

No: Jabalpur Date19/02/09

To

Respected Sir,

By the grace of almighty I am going to launch album comprising of Sai Bhajan named Baware Faqeera on 14 March 2009 at 07:30P.M. Manas Bhawan Jabalpur in presence of honorable guest and Abhas Joshi.

This audio album is dedicated to my mother late Mrs.Pramila Billore who encouraged me to prepare devotional album to help” Polio Suffering Children”. Also profit earned through this album will be given to District-Administration for making arrangement of Lifeline Express. Kindly give us your cooperation for above event.

Sponser Ship :

  • Main Gate
  • Stage
  • Momentose

  • Invitation
  • Banner

  • Album Cover


Thanking you

GIRISH BILLORE “MUKUL”

PRODUCER {HONARARY & LYRICIST}

CONTACT: 969/A GATE NO.4 WRIGHT TOWN, JABALPUR

Phone’s: 09926471072, 0761:4082593, 2404900

Email’s : girishbillore@gmail.com,

girishbillore@hotmail.com

आखिरी पंक्ति बवाल पूरा करेगे

माना कि मयकशी के तरीके बदल गए
साकी कि अदा में कोई बदलाव नहीं है..!
गर इश्क है तो इश्क की तरहा ही कीजिये
ये पाँच साल का कोई चुनाव नहीं है ..?
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गिद्धों से कहो तालीम लें हमसे ज़रा आके
नौंचा है हमने जिसको वो ज़िंदा अभी भी है
सूली चढाया था मुंसिफ ने कल जिसे -
हर दिल के कोने में वो जीना अभी भी है !
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यूँ आईने के सामने बैठते वो कब तलक
मीजान-ए-खूबसूरती, बतातीं जो फब्तियां !
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डूबे जी की भेंट





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जबलपुर में तक सौ से अधिक ब्लॉगर तैयार कराने की लिए डूबेजी आए उनके साथ थे बुन्देली कवि जिनका उर्दू पर भी अधिकार है "राज़ सागरी जी " जिनका ब्लॉग तैयार करते मुझे आनंद आ रहा था कि भाई दुबे जी कितने प्रतिबद्ध हैं .... ब्लागिंग को बढावा देने .....!! इधर हम व्यस्त थे राज़ सागरी जी का ब्लॉग बुन्देली-राज़ बनाने उधर मेरी बेटी श्रद्धा दूबेजी से कहती सुनी गई :-"अंकल आप डूबे जी बनाना कभी मत छोड़ना !"बिटिया की दुआ थी या ईश्वर का संदेश हमको नहीं मालूम इतना तय है की डूबे जी की कला उनको शीर्ष पर ले जाएगी ।
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स्थानीय दैनिक समाचार पत्र नई दुनियाँ के कार्टूनिष्ट श्री डूबे जी उर्फ़ श्री राजेश दुबे जी के स्नेहीयों की कमी नहीं है । मेरे घर जितने भी समाचार पत्र आते हैं उनमें सबसे ज़्यादा इधर-उधर खोने वाला वो अखबार होता है जिसमें डूबे जी होते हैं।इस अखबार के उस पन्ने को लेकर अक्सर मेरा भतीजा गुरु और श्रद्धा के बीच झगडा भी हो जाता है । उपर डूबे जी की भेंट पर बिटिया की टिप्पणी वाह !वाह...!!
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नए ब्लॉगर श्री राज़ सगरी के प्रति आभार की वे हमारी बिरादरी में शामिल हुए । कल देर रात एक नई ब्लॉगर का पदार्पण हो ही जाएगा ब्लॉग जगत में समीर भाई के जबलपुर में होने का अर्थ अब मुझे ..... शायद सभी को समझ में आ ही रहा है...........?

यानी ओबामा हनुमान भक्त नहीं.......?


बराक हुसैन ओबामा ने अमेरीकी राष्ट्रपति पद पर जुमा जुमा चार दिनही गुजारे और बहू की बुराई जैसी स्थिति पैदा हो गयी {कर दी गई }डैनियल पाइप्स ने उन्हौने ओबामा , पर उठतीं अंगुलियाँ अमेरीकी सोच को कितना बदलेगी यब बात ख़ुद डैनियल पाइप्स को कितनी पता है समझ से परे है । किंतु यह सोच उछाल कर पाइप्स ने ओबामा के ख़िलाफ़ एक छद्म आन्दोलन का आगाज़ ज़रूर कर दिया . शायद ओबामा को इस्लामिक यद्यपि उनकी नज़र में उनके इस आलेख को वे प्रारम्भिक यानी => Initial Assessment मान रहे हैं ..... किंतु जब प्रारंभ इतना सनसनीखेज हो तो तय है ओबामा की एक भी चूक अमेरिकी सियासत में हंगामा खडा कर सकती है। अमिताभ त्रिपाठी द्वारा अनूदित पाइप्स का आलेखांश देंखें :-

प्रश्न है कि नए अमेरिकी राष्ट्रपति का कार्यकाल 209 हफ्तों का है, बावजूद इसके, सिर्फ 2 हफ्तों के बाद ही, मध्यपूर्व और इस्लाम जैसे गूढ़ मसले पर उनके नज़रिए को समझने की कोशिश भला क्यों की जाए। लेकिन बराक हुसैन ओबामा के हावभाव को देखते हुए ये बेहद जरुरी हो जाता है। वैसे इस मसले पर चर्चा की ठोस वजह और भी हैं।

एक विरोधाभासी कीर्तिमान- नए अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के अतीत के तार यहू दियों के कट्टर विरोधी माने जानेवाले- अली अबुनीमाह, राशिद खालिदी और एडवर्ड सैड जैसे लोगों से जुड़े रहे हैं। ओबामा का संपर्क इस्लामिक देशों के साथ-साथ सद्दाम हुसैन के कार्यकाल से भी रहा है। लेकिन राष्ट्रपति की कुर्सी संभालने के बाद, ओबामा ने केन्द्रीय वामपंथी नज़रिया रखने वाले लोगों की नियुक्तियां की हैं और वे स्वयं पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जैसी ही भाषा बोल रहे हैं।

विमर्श के तौर पर यह आलेख जैसा भी हो मेरी नज़र में कयास मात्र है यदि सही भी हो तो हमें आसन्न खतरे की आहट सुनाई नहीं दे रही क्योंकि "ओबामा को अमेरिकी जनता ने कुछ तो परखा होगा "

मूल आलेख यहाँ मिलेगा अनुवादित आलेख हेतु इधर चटका लगाइए

मुझे रोकने का किसी के पास कोई अधि कार नहीं है

जी हाँ .... मुझे प्रीत करनी है ............. मुझे रोकने का किसी के पास कोई अधि कार नहीं है
............... ये सर्वथा वैयक्तिक विषय होना चाहिए .... रही धर्म की बात तो मेरा धर्म यदि प्रीत है तब आप क्या कीजिए गा..?आप से जो किया जाए कीजिए मुझे मोहब्बतों का पैगाम देना है यदि यह ग़लत है तो क्या यह सही है .....
*सियासतें सरहदें सरकार इश्क के पर्व को रेग्यूलेट करनें की अधिकारी क्यों हों ...?
*क्या कृष्ण ने प्रीत संदेसा नहीं दिया था दुनिया को
* कौन सा ऐसा मज़हब है जिसे प्रवर्तक ने सिर्फ़ आराध्य के किए लिए प्रवर्तित किया है सच तो यह है कि "सिर्फ़ और सिर्फ़ मासूम जनता जनार्दन के लिए प्रवर्तित किए गए हैं ..किसी ने प्रीत को प्रतिबंधित नहीं किया !!"
*संत वैलेंटाइन में अगर आपको व्यावसायिकता नज़र आ रही है तो क्या किसी अन्य व्यवस्था में व्यवसाय नहीं होता इस पर ज़्यादा खुलासा होता है तो भावनाएं आहात कराने का आरोप दे दिया जाता है ...?
* मुझे इश्क करने से आप क्यों रोकेगें मैं अपनी देश के प्रेम में पागल हो जाऊं ? या समूची मानवता को प्रेम पाश में बांधना चाहूँ और रहा दिवस चुनने का मामला तो मैं कोई भी दिवस चुन लूँ आप क्यों नाराज़ होंगे क्या प्रेम और शान्ति की अवधारणा को किसी भी धर्म से अलग कर सकते हो,,,,,?
मुझे जिन सवालों के उत्तर चाहिए वो तुम्हारे पास नहीं हैं यही है "वयम-रक्षाम:"का उदघोष मुझे प्यार करने दो तुम भी प्यार करो उसे भी प्यार करने दो हम सब प्यार करें - हर-क्षण करें राम से करें सब करें किसी को कोई हर्ज़ हो तो बताइये .................

पुराने जोड़े यूँ मनाएं वैलेनटाइन-डे

इश्क कीजे खुलकर सरे आम कीजे भला पूजा भी कोई छिप-छिप के किया करता है..?
मेरे महबूब तुझसे इज़हार-ए-तमन्ना न कर सकने के कारण जो भी थे उन में उस वक़्त की मेरी मज़बूरियाँ थीं . और अब गुलाब तुमको भेजना ग़लत है .... तब भी तुम मुझे अक्सर याद आ ही जातीं हो ...? क्यों क्या मेरी बेबसी को तुम समझ न सकी थीं ...... तुमने ये गीत मुझे सुनाने के बहाने कितने बार गुनगुनाया होगा ?
और उन दिनों मैंने ये गीत कितनी बार गाया समझा तुम समझ न सकीं ।
"मेरे महबूब'' माना की वो दौर सादगी का था संजीदगी का था फ़िर मुझसे भी तो भूल हुई गोया मैं ये
गीत गा देता और तुम समझ जातीं ये गीत गातीं फ़िर मैं डोली लेकर तुम्हारे आँगन आने बेताब हो जाता .
ये सब न हुआ कोई बात नहीं तुम मेरी थीं हो और रहोगी । अब देखो न हमारे बच्चे बड़े हो रहें हैं दिन भर की बेकाबू व्यस्तताओं के बीच मनाएं प्रेम दिवस रोज़ मनाएं न बजरंगीयों का डर है यहाँ न तालिबानों का .... मेरे रहबर तुम एक मुसलसल प्रेम गीत की भूमिका हो मुझे मत भूलना अब मैं ऐसे मदिर और रूमानी - से ऊपर आ गया हूँ तुम भी प्रेमिका नहीं मेरी आत्मा हो चुकी हो आओ हम प्रीत में खो जाएँ । औरों को मणि-कंचन-संयोग की बानगी बताए ।
*हर *अन्दर लाइन शब्द *के *पीछे*एक रूमानी*गीत*सुनिए*और प्रेम दिव*मनाइए *

बैरागी जी आपका ऋणी हो गया हूँ ....!

[फोटो : साभार किंतु बिना पूर्व अनुमति के विष्णु बैरागी जी की ताज़ा पोस्ट से आशा है वे अनुमति दे देंदे ]
मनु श्रीवास्तव आई ए एस
एस० डी ० एम ० ,सिटी मजिस्ट्रेट.जबलपुर
यह पता था उनका जबलपुर में . प्रोबेशनर थे . मुझे भी सरकारी नौकर हुए तीन बरस हुए थे .मध्य-प्रदेश महिला आर्थिक विकास निगम ने पहली बार भोपाल के स्थान पर संभागीय स्तर पे मेला आयोजित किया । मेले की ज़वाबदेही कलेक्टर श्री विवेक डांड जी ने सौंपी थी युवा प्रोबेशनर मनु जी को । मैंने आई ए एस अधिकारीयों के बारे में जो देख सुना था सो मेरी राय भी वैसी ही थी जैसी एक आम अधिकारी की होनी चाहिए। सर से दूरी भी उसी अवधारणा के कारण मैंने बना ली थी । मेरे एक बाबू साब ने मुझे चेताया भी था कि अधिकारीयों से कितना पास रहें कितना दूर ... सो उनके अनुभव को मान्यता देते हुए अपने राम बस सर से दूर रहने की कोशिश मैं थे .... और सर थे कि ज़बरदस्त प्रतिभा के धनी ज़्यादा देर दूरी न बना सका उनसे । बस अधिकतम दो घंटे में सारे भ्रम दूर कर दिए मनु जी ने । मेरे उनके बीच कोई फासला न था बस 93 का ममत्व-मेला उनके निर्देशन में शुरू हुआ ।
उदघाटन सत्र में ही कलेक्टर श्री विवेक डांड जी के नाम का संचालन में उल्लेख न करने की भयंकर तम त्रुटि मुझसे संचालन के दौरान हुई किंतु मुझे क्षमा दान मिला बिना माफी मांगे इस भयंकर भूल का रिज़ल्ट कुछ भी हो सकता था जिसका एहसास भी मुझे मेरी एक सहयोगी श्रीमती माया भदौरिया ने कराई किंतु भूल तो भूल थी घबराया हुआ में जब नोडल-आफिसर मनु सर के सामने आया तो उनने मुझे इतना उत्साहित किया कि मन से अपराध बोध कहाँ गायब हुआ मुझे नहीं मालूम।
"आप,इप्टा का कोई नाटक करवा सकते हो ?"
"जी,सर लेकिन ये नाटक शासकीय "
"न भाई ऐसा नहीं है सामाजिक विषयों पहोते है "
मनु सर के निर्देश पर इप्टा/विवेचना के श्री अरुण पांडे जी से अनुरोध किया । अरुण भाई ने अपने अन्य प्रस्तावित नाटकों कि तिथियों में संशोधन कर लगातार तीन नाटकों का मंचन कराया ।
भंवरताल गार्डन में महिला उद्द्यमियों के उत्पाद और सांस्कृतिक छटा का ऐसा रंग जमा कि पूरा शहर उमड़ पडा था । एक नन्हीं बालिका दिव्या चौबे के नृत्य को उसी मंच से पहली बार देखे गए तो हास्य व्यंग्य के रंग भी बिखरे . रामलाल चडार राजस्व निरीक्षक के बुन्देली नृत्य,संजय खन्ना की कोरियोग्राफी,इंजीनियरिंग कालेज के युवाओं की टोली, स्कूली बच्चों की प्रस्तुतियां और जाने कितने कार्यक्रम लगातार पाँच दिन तक जारी थे । कुल व्यापार भी उस दौर में पाँच लाख के आसपास। जबलपुर
ममत्व-मेलामें ही जबलपुर के कारीगरों नें मिट्टी के वाटर-फिल्टर की प्रविधि सीखी। छिन्दवाडा की फेनी कास्वाद अब तक बाकी है। याद आया मनु सर आपको
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एस डी एम होने के नाते गुमाश्ता क़ानून का पालन कराना उनका दायित्व था । सो एक रविवार पापा की दूकान में साफ़ सफाई का काम कराने गया । तभी कलेक्टोरेट से पीली बत्ती वाली जीप ऐन बिल्लोरे ब्रदर्स के सामने रुकी मैं लुंगी-बनियान पहना दूकान में रखी बरनियों को साफ़ कर रहा था जीप से उतरे सैनिक ने लगभग मुझे डपट हुए कहा साहब बुला रहे हैं ...!
जैसे ही मैं पहुंचा -वे हतप्रभ मुझे देखते रह गए ... क्यों दूकान ॥?
जी सर, पापा रेलवे से रिटायर्ड हैं समय के सदुपयोग के लिए दूकान डाली है ...... आज संडे का दिन दूकान की साफ़ सफाई ........... ?
ठीक है, शटर आधा बंद करके पापा के काम में मदद करिए ।
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उनकी सादगी और सहजता पर सब मोहित थे
. मैं जान चुका था कि वे कवि ह्रदय साहित्य प्रेमी हैं किंतु कभी बैठक का मौका नहीं मिला. छिंदवाडा में पदस्थी के दौरान मनु सर से फोन पर शासकीय काम के सिलसिले में चर्चा हो जाया करती थी । फ़िर मुझे भी ट्रांसफर की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा । सिलसिला थम सा गया । कल ही प्रशांत कौरव ने प्रज्ञा जी के कुशल क्षेम का ज़िक्र किया विष्णु बैरागी जी की पोस्ट में विवरण मिला आई डी सहित सो बता दूँ जी कि आज ही मनु सर याद आए थे जब मैं न जा सका बिटिया दिव्या चौबे की शादी में । विष्णु जी संयोग ही कहिए आपकी पोस्ट,बीते दिनों का ममत्व मेला, १९९३ की यादें सब न्यूज़-रील सी आंखों के सामने से गुज़र रहीं हैं आज उसी दिव्या की शादी भी थी जिसने तब शुरुआती मंचीय प्रस्तुति दीं थीं जब मनु सर जबलपुर में थे

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सर याद होगी ये कविता "
दिन में सरोवर के तट पर
सांझ ढ्ले पीपल "
सूर्य की सुनहरी धूप में
या रात के भयावह रूप में
गुन गुनाहट पंछी की
मुस्कराहट पंथी की बाकी रह जाती है बाकी रह जाती है ।
हर दिन नया दिन है
हर रात नई रात
मेरे मीट इनमे
दिन की धूमिल स्मृति
रात की अविरल गति
बाकी रह जाती है बाकी रह जाती है
सपने सतरंगी
समर्पण बहुरंगी

जीवन के हर एक क्षण
दर्पण के लघुलम कण
टूट बिखर जाएँ भी
हर कण की "क्षण-स्मृति"
हर क्षण की कण स्मृति
बाकी रह जाती है बाकी रह जाती है





केले के बिना पूजा भी नहीं होती विवेक जी








भाई ......जी
सादर-अभिवादन
आपकी चर्चा बांच के लगा की आप अल्ल सुबह ही ले लेतें है.. ब्लॉग की मदिर मदिरा ....?
भाई आप वाकई बड़े जोरदार असरदार लेखन क्षमताओं के धनी हैं ।
मित्र आप को याद होगा "सूर-सूर तुलसी शशि ...!" पर क्या करें आज कल खद्योत भी नेनो टेक्नोलोजी से बने टेल लेम्प अपने दक्षणावर्त्य में चिपकाए घूम रहे हैं और लोग भ्रमित हैं कि सूरज है । भैया पूजा-पाठ के बाद ज़रा आत्म-चिंतन हो जाए "नर्मदे हर हर "
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सभी भक्तगणों को बाबा का आशीर्वाद ! सूचना मिली है कि आज की चर्चा को पढकर हमारे कुछ भक्तों की भावनाएं आहत हुई हैं . महाभारत से जो काल्पनिक प्रसंग लिया गया उसके बारे में आपत्तियाँ पाकर बाबा को पूरा विश्वास हो गया है कि कहीं कुछ गडबड है . अन्यथा उस प्रसंग पर आपत्ति लायक कुछ है नहीं . रही बात 'डबलपुर' के विषय पर लिखी गई कविता की, तो उसको कवि ने एक काल्पनिक शहर 'डबलपुर' के बारे में लिखा है . यदि ध्वनिसाम्य के कारण हमारे 'जबलपुर' निवासी कुछ भक्तों को ठेस पहुँची तो उसके लिए हमें खेद है . इस बारे में हो सकता है कि धवलपुर , नवलपुर , और सबलपुर आदि अन्य ध्वनिसाम्य वाले शहरों के निवासियों को भी आपत्ति हो उनके लिए भी एडवांस में खेद है . बाकी तो गुसाईं जी लिख ही गए हैं : " जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी " फिर भी एक बात पर तो सभी सहमत होंगे कि कोई शहर छोटा या बडा नहीं सभी का अपना महत्व है . और किसी शहर में पैदा होना चूँकि किसी के हाथ में नहीं इसलिए यह कोई घमण्ड करने लायक बात नहीं . जिन लोगों ने इस मुद्दे पर अपने विचार रखे वे बधाई के पात्र हैं ।
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आप के उपरोक्त रक्तवर्णीय स्पष्टीकरण में भी एक अजीब सी बैचेनी नज़र आई है। भईया आत्म-चिंतन का विषय है आप मेरे छोटे भाई सद्रश्य दिखा रहे हैं अत: आपको बता दूँ कि साहित्य की विधा में चिट्ठाकारिता का इतिहास आने वाले समय में ऐसा दर्ज हो कि आप को सभी सम्मान से स्मरण करें और आप अपने आप में इन दिनों की सुंदर यादों के ज़रिये सुखी हों ।
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कभी कभी कमसिनी के पाप बुजुर्गियत में मुंह आए अपमानित करते हैं । इस बात का आपसे कोई सम्बन्ध है या नहीं मुझे नहीं मालूम पर इतना जानता हूँ कला हिंसक नहीं होती और साहित्य की धार तलवारी नहीं होती .... वो तो रेवा,सतलज ब्रह्मपुत्र,गंगा की धार सी होती है। अत: आपका सृजन आपका ओज बढाए मेरी कामना है।
रहा जबलपुर को परिभाषित करना सो मित्र : बकौल घनश्याम चौरसिया "बादल"-'खदानों के पत्थर जो अनुमानते हैं मेरे घर की बुनियादें वो जानतें है ।
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आपने मेरे और महेंद्र मिश्र के बीच की किसी युद्ध की आहट सुनी और फ़िर आप का युद्ध के प्रति आकर्षण हम सभी ने जाना आल्हा तक लिख मारी ।
सच कहूं आपको पीड़ा होगी .... तो सुनिए :-
मेरी भाई मिश्र से न तो रंजिश थी न है न रहेगी । मसला कुल इतना था कि वे मीत में बीमार होने के कारण न आ सके और मैंने उनसे न आने पर प्यार भरी तकरार की जिसे "रार" माना गया जबकि वह इकरार था ।
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आप ने आल्हा लिखी अच्छा लगा कि आप "माइंड ब्लोइंग माहिया "के दौर में परम्परा के पालक हैं किंतु विषय वस्तु का विषाक्त होना कहाँ तक लाजिमी है मित्र । आप में उर्जा है उसे सृजनात्मक बनाएं विध्वंशात्मक न होने देन
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मित्र आप बेर क्यों कह रहें हैं अपने आप को आप भी केले का वृक्ष बनिए कितना मान मिलता है आपको मालूम ही है ।
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आशा है विवेक भाई अब "इन अपमान कारक टिप्पणियों पर पुन:विचार करेंगे

चलते-चलते
हम सभी डबलपुरिया ब्लॉगर, यह मिलकर घोषित करते हैं ।
है खास हमारा ही दर्ज़ा, बाकी सब पानी भरते हैं ॥

कुछ पूर्वजन्म में पुण्य किये, इसलिए डबलपुर में जन्मे ।
जो जन्मे हैं अन्यत्र कहीं, है पाप भरा उनके मन में ॥

पापियों करो कुछ पुण्य आज, सुर मिला हमारे ही सुर में ।
तुम साड्डे नाल रहोगे तो, है अगला जन्म डबलपुर में ॥

वन्दे मातरम सुनाते तो, फिर भारतीय ही हम रहते ।
होता है उससे धर्म भृष्ट, इसलिए नर्मदे हर कहते ॥

इस ब्लॉगजगत में शहरवाद, का जहर मिलाया है हमने ।
नर्मदा हमारे ही बल से, बहती न दिया उसको थमने ॥

तुम भारतीय गंगू तेली, हम राजा भोज कहाते हैं ।
हम राज ठाकरे के ताऊ, आमचा डबलपुर गाते हैं ॥

पहल नशा पहला खुमार

इस से आगे बांची जाए



प्रेम-संदेशा, विरहनियों से सुन-सुन उनके हरजाई को भेजते कागा की करतूतें उनसे से कतई कमतर नहीं होतीं.......!!
वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है…">वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है…">01:-वैलेंटाईन - मायने कित्ते बदल गए भैया अब कानपुर के सुकुल जी -काग-कागी प्रेम चित्र छापे अपने दिल में सुईसितार गिटार सब बज गईं अपन नै सफ्फा-सफ्फा कह दओ-" अब देख्यो सुकुल भैया जे जो काग...जी...कागी-भौजी से चूंच लड़ा रए हैं अच्छो लगो मनो साँची बात जा है कै पिछले साल वैलेंटाईन उर्फ़ विलेनटाइम पे कागी-भौजी कोऊ और हथी !!पिछली साल वारी कागी-भौजी को आवेदन हमाए दफ्तर में दाखिल है हम घरेलू हिंसा क़ानून में हमें "संरक्षण-अधिकारी जो बनाओ है "जो भी कागी खों उनके कागा की हरकत अबके वैलेंटाईन पे परेशान करें सो हमाए पास आ जाएँ हम "डोमेस्टिक-इन्सिडेंस-रपट"D.I.R.) तैयार कर दें हैं ।
02:-एक दिन एक प्रेमिका ने प्रेमी हरकतों से तंग आकरसोचा की उसे सबक सिखायाजाए हजूर बस जिद्द पड़ गईसंत
वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है…">वैलेंटाईन दिवस पर बरगी डैम में क्रूज़ पे वहाँ के बाद नरमदा माई के किनारों पे कहीं चौंच लड़ाई जाए । मियाँ मोहब्बत लाल जी ने मित्र के खीसा खलासी ली और बस इश्क की राह पे निकल पडा । डेम पहुंचते क्रूज़ पे सवार हो अपनी ये जोड़ी तिकोना भाग देख-खोज रही थी। जहाँ टाईटैनिकी अंदाज़ में इश्क का इज़हार हो ज़नाब वहाँ उन महाशय की पुरानी प्रेमिका अपनी सखियों के साथ आयीं थी सब से मिल के पुरानी प्रेमिका ने इस जोड़े की वो गत बनाई कि दोनों के सर "इशक का भूत" यूँ गायब हुआ ज्यों कि कभी कभी पेट्रोल पम्प से प्रेट्रोल
03:- अपन भी इश्क से अछूते कहाँ थे कालेज के दिनों में जिस कन्या में अपन महबूबा की क्षवि देखरहे थे एक दिन हमारी घर वो,उनके पापा,मम्मी, मुस्टंडा टाइप का भाई सब आए शायद यही कोईबसंत का महीना था सारे के सारे सपने हमारी भय के मारे काँप रहे थे जिसका अहसास हमारीजिस्म पे भी नज़र रहा हमें लगा कि आज हमारी खैर नहीं ...... जैसे ही माँ-बाबू जी ने उनका भावपूर्ण सम्मान किया उनकी बेटी को स्नेहिल दुलार दिया हमको संभावना नज़र आने लगी बसकनखियों से सुकन्या को निहारते कभी आदर्श पुत्र का एहसास दिलाते माँ-बाबू जी को
कन्या के माता-पिता नें बड़े प्रेम से बाबूजी को सुंदर सा कार्ड देकर कहा :-"ज़रूर आना भैया इकलौतीबिटिया की शादी है फ़िर आप का मार्ग दर्शन ज़रूरी भी है " बेटे तुम तो ज़रूर दो-चार दिन पहले से जाना तुम्हारी छोटी बहन की शादी समझो ....?
उनकी बीवी तपाक से बोली:-समझो क्या है इच्च .....!!



ब्लॉग-पार्लियामेन्ट: पहला संशोधन

1. ब्लागाध्यक्ष: एक पद
2. प्रधान-ब्लॉग-मंत्री
3. अन्तर-राष्ट्रीय मामलों के मंत्री
4. कायदा-मंत्री के आगे अल न लग जाए अत: क़ानून-मंत्री कहा जावे टिप्पणी-मंत्री
6. प्रति-टिप्पणी मंत्री
7. गुम-नाम टिप्पणी प्रतिषेध-मानती में मानती को मंत्री बांचिये
8. बिन-पडी पोस्ट टिपियाना मंत्री को सुधार कर "बिन-बांच टिप्पणी टांक मंत्रालय " करा दिया है
9. नारी-ब्लॉग मंत्री
10। राजनीतिक /धर्म/संस्कृति/तकनीकी सहित उतने मंत्री होंगें जितने विषयों पर ब्लॉग लिखे जा रहें हैं।
इस संशोधन की ज़रूरत थी पोस्ट में संशोधन के लिए सहयोगी मित्रों का आभार : गुरु अनूप जी वे भी इसकी चर्चा की है यहाँ उनका हूँ :
आ....भारी ..............आभारी

मनविंदर जी से प्रेरित हो कर पुनर्प्रकाशन


मनविंदर जी ने कहा कि
मित्रों मुझे भी नारी के लिए लिखी पंक्तियाँ याद आयीं

तुम् औरत हों तुम् केवल अनुगमन करो.....!
तुम् को हक नहीं धर्म के उपदेश देने का ।
जीने के सन्देश देने का ।
तुम् केवल औरत हों तुम् केवल अनुगमन करो.....!
**************
तुम,और तुम्हारी सुन्दरता हमारी संपदा .... !
तुम से हमारी सत्ता प्रूफ़ होती है !
तुम सत्ता में गयीं तो आती है आपदा ....!
तुम केवल स्वपन देखो शयन करो ........
******************
तुम पद प्रतिष्ठा से दूर रहो ....
कामनी वामा रमणी के रूप में बिखेरो
हमारे लिए लटें अपनी मध्य रात्री में...
अल्ल-सुबह की धूप में ...!
तुम हमारे लिए केवल सौन्दर्य - सृजन करो .....
******************
तुम काम और काम के लिए हों
तुम मेरी तृप्ति और मेरे मान के लिए हों.....!
तुम धर्म की ध्वजा हाथ में मत उठाओ
हमको अयोग्य मत ठहराओ.....!
तुम् वस्तु थीं वस्तु हों और वस्तु ही रहोगी .....!!
रमणी सुकोमल शैया पर सोने वाली मठों में रहोगी.......?
*********************
मैं आगे चलूँगा सदा तुम केवल मेरा अनुगमन करो ....!
मेरी अंक शयना मेरे स्वपन लिए सेज पर प्रतीक्षा रत रहो !

ब्लॉग-पार्लियामेन्ट

ब्लॉग जगत अब प्रजातान्त्रिक-सूत्र में पिरोया जाने वाला है। इसकी कवायद कई दिनों से फुनिया फुनिया के कई दिनों से जारी थी. सूत्रों ने बताया इस के लिए आभासी-संविधान की संरचना के प्रयास युद्ध स्तर पर जारी हैं . बताया जाता है की जिस शहर में सर्वाधिक ब्लॉगर होंगे उसे "ब्लागधानी "बना दिया जाएगा . ब्लॉग'स में प्रान्त/भाषा/जाति/वरन/वर्ग/आयु का कोई भेदभाव नहीं होगा . कुन्नू सिंह की अध्यक्षता में बनने वाली ब्लॉग-संविधान की संरचना की जानी लभग तय है. जिसके प्रावधानों में निहित होगी ब्लॉग-सरकार की व्यवस्थाएं .अंतरिम-सरकार के सम्बन्ध में अनाधिकृत जानकारी के अनुसार एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाना है जिसका संघीय स्वरुप होगा . तथा शासनाध्यक्ष /मंत्रालय की निम्नानुसार व्यवस्था प्रस्तावित होगी :-

  1. ब्लागाध्यक्ष: एक पद
  2. प्रधान-ब्लॉग-मंत्री
  3. अन्तर-राष्ट्रीय मामलों के मंत्री
  4. कायदा-मंत्री
  5. टिप्पणी-मंत्री
  6. प्रति-टिप्पणी मंत्री
  7. गुम-नाम टिप्पणी प्रतिषेध-मानती
  8. बिन-पडी पोस्ट टिपियाना मंत्री
  9. नारी-ब्लॉग मंत्री
  10. राजनीतिक /धर्म/संस्कृति/तकनीकी सहित उतने मंत्री होंगें जितने विषयों पर ब्लॉग लिखे जा रहें हैं।
इस सबके लिए गूगल बाबा से भरपूर मदद के आश्वासनों से बारे जहाज उड़नतश्तरी के पीछे-पीछे जबालिपुरम के तेवर नामक स्थान पर आराम से उतर गए हैं । फुर्सत मिलते ही फ़ुरसतिया जी रवि रतलामी जी के अलावा नीचे लिखी सूची में दर्ज ब्लॉग मालिक आने वाले है .......
पढ़ें">1. मानसिक हलचल
पढ़ें">2. मोहल्ला
पढ़ें">3. हिन्द-युग्म
पढ़ें">4. सारथी
पढ़ें">5. फुरसतिया
पढ़ें">6. उडन तश्तरी ....
पढ़ें">7. अज़दक
पढ़ें">8. भड़ास blog
पढ़ें">9. एक हिंदुस्तानी की डायरी
पढ़ें">10. निर्मल-आनन्द
पढ़ें">11. Raviratlami Ka Hindi Blog
पढ़ें">12. आलोक पुराणिक की अगड़म बगड़म
पढ़ें">13. रचनाकार
पढ़ें">14. शब्दों का सफर
पढ़ें">15. चिट्ठा चर्चा
पढ़ें">16. कबाड़खाना
पढ़ें">17. प्रत्यक्षा
पढ़ें">18. शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग
पढ़ें">19. चोखेर बाली
पढ़ें">20. मसिजीवी
पढ़ें">21. ॥दस्तक॥
पढ़ें">22. दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका
पढ़ें">23. कस्‍बा qasba
पढ़ें">24. Rudra Sandesh
पढ़ें">25. दीपक भारतदीप का चिंतन
पढ़ें">26. यूनुस ख़ान का हिंदी ब्‍लॉग : रेडियो वाणी ----yunus khan ka hindi blog RADIOVANI
पढ़ें">27. मेरा पन्ना
पढ़ें">28. महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar)
पढ़ें">29. जोगलिखी
पढ़ें">30. कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **
पढ़ें">31. रामपुरिया का हरयाणवी ताऊनामा !
पढ़ें">32. नारी
पढ़ें">33. समाजवादी जनपरिषद
पढ़ें">34. घुघूतीबासूती
पढ़ें">35. एक शाम मेरे नाम
पढ़ें">36. महाशक्ति
पढ़ें">37. दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
पढ़ें">38. दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!
पढ़ें">39. एकोऽहम्
पढ़ें">40. आवाज़
इस चालीसा के अलावा १०० से अधिक बिलागर जबलपुर के ही होंगे अभी 20-25 हैं मार्च के बाद 100 से अधिक होंगे
"बोलो नरमदा माइ की जय !!हर-हर नर्मदे !!"

बाल विकास सेवाओं के लिए कार्यकर्ता श्रीमती तारा काछी को श्रेष्ठता सम्मान

बाल विकास परियोजना बरगी,जबलपुर,आंगनवाडी-केन्द्र, - तिलहरी की सजग कार्यकर्ता श्रीमती तारा काछी, द्वारा आंगनवाडी जिस दक्षता
के साथ कार्य कर रहीं है उसके परिणाम स्वरुप उनको २६ जनवरी ०९ को श्रेष्ठता सम्मान से अलंकृत किया गया , बधाइयां
क्यों सम्मानित हुई तारा
  • 3 साल से उनके क्षेत्र में कोई शिशु-मृत्यु नहीं हुई
  • न ही कोई माँ ने प्रसव के समय जीवन त्यागा
  • तारा के गाँव में अशिक्षा नहीं है
  • तारा साल में एक बार गाँव की बेटियों को इकट्ठा करके घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाओं को राखी बांधतीं हैं...
    इस बहाने उन बेटियों से कहलवाया जाता है की कच्ची उम्र में ससुराल मत भेजना माँ............!!

एक-समारोह की चल-रिपोर्ट

समारोह की चल-रिपोर्ट
ठीकराफोड़ एवं टीकाकरणसमारोह http://billoresblog.blogspot.com/2009/02/blog-post_02.html के बाद मेरी और से बात समाप्त कर दी गयी है .अब अंत में सत्य को अनावृत करना ज़रूरी है वास्तव में मुझे दुःख हुआ इस पूरी घटना के पीछे इर्शोत्पादक तत्व की भूमिका थी साथ ही शहर के कुछ ऐसे लोग बेनकाब हुए जो मेरे धुर विरोधी हैं ..नामचीन भी हैं ... मामला साफ़ है
डाक्टर अमर कुमार जी समीर लाल जी अनूप जी ,जबलपुर ब्लागर्स मीट तो एक बहाना था समीर भाई कई दिनों से जबलपुर में हैं व्यस्त भी रहते है अत: मित्रों की सलाह पर मीट रखी गयी थी जिसके बाद विद्रोही स्वर उभरे मैंने उसे नज़र अंदाज़ किया बाई ने वन मेन शो,बिलोरन यानि बिगाड़ करना,कलम से भी विकालांग (वास्तव में मुझे पोलियो है ), अखबारी मेटर को हूँ ब हूँ पोस्ट बनाने वाला(जबकि ख़ुद इस पेशे के महारथी हैं जिसका ज्ञान एक बार मैंने इनको करा दिया था ),कहा गया किंतु जब मैंने सच लिखना शुरू किया तो हालत ख़राब हो गयी श्रीमन की . तनवीर जाफरी / के नाम से मेरी एक रचना वेब पत्रिका में आने से मैंने जब आपत्ति दर्ज की तो ये महाशय मेरे साथ थे ..ताज़ा पोस्ट में उस घटना को लेकर इन्होने टीक टिप्पणी की फ़िर इनके सुर में कई सुर मिले जो किसी करीब आते बवाल की ओर प्रतीक्षा भाव से निहार रहे थे . कुछ ऐसे लोग भी जो मेरी आस्तीन में थे उकसाने लगे . यहाँ तक तो ठीक था किंतु जब मैंने अपनी विकलांगता का उपहास कराने वाले इन मित्र से ओर कैफियत माँगी तो बचने के लिए इनने शोर-शराबा शुरू कर दिया. हर शहर में गुटबंदी लाम बंदी है साहित्यकार यही सब कर रहें हैं , सो मेरी मंशा थी कि किताबों के साथ हिन्दी अंतरजाल पर छा जाए जबलपुर के कवि लेखक इससे लाभान्वित हों ओर कारपोरेशन सीमा से बाहर आएं . कोशिश भी की . किंतु "मुंडे-मुंडे मतिर भिन्ना" लोग इस विधा को तार तार कराने मौका देख रहे थे .......... जब उनको पता चला कि मौका है तीर चला दिया कान्धा मिला बन्दूक रखी ओर दाग दी. अब ये लोग कभी आप से मिलेंगे तो ब्लागिंग की भद्द पीटेंगे. भाई क्रोध इतना की खुली गुंडई भाषा का प्रयोग उस पर 25 जनवरी से लगातार आ रही उनकी पोस्टों ने मुझे हिला कर रख दिया. जाने कितने असम्मानित शब्दों का प्रयोग लगातार ..... तब मुझे मज़बूरन सामने आना पडा सामने आयी अभद्रता . अपने ब्लॉग का ट्रैफिक बढाने भाई ने हर हथकंडे अपनाए .... चर्चा में लिपटने के बाद थोडी समझ आयी . इनने एक ब्लॉग पर टिप्पणी के साथ ब्लागर को लिंक हटाने की चेतावनी तक दे डाली . मुझे ज्ञात हुआ कि मीट के पहले बने काकस ने मेरी 26 जनवरी की सरकारी व्यस्तताओं के चलते बाकायदा संगठित रूप से मुहिम चला दी.जिन्होंने भी इन भोले महाशय को भड़काया है वे सच कितने महान हैं इस बात का पता इनको जल्द लग जाएगा ...
आप जो भी कहें हिंसा किस हद तक सही जा सकती है..........?अब बताएं कितने गाल ला दूँ इनकी तृप्ति के लिए फ़िर भी सीनियर्स की सलाह पर मैं विवाद को अपनी और समाप्त कर चुका हूँ सो चिट्ठा चर्चा में इस पर आधारित टिप्पणियाँ बंद कर दीं जाना ही उचित होगा,

ठीकराफोड़ एवं टीकाकरणसमारोह


एक भाई साहब इर्दगिर्द भी ऐसा ही कुछ घट रहा है जो लोग उसे जानते भी नहीं बेचारे स्नेह वश उसके माथे पे टीका लगा के चले जातें हैं क्रम चला आगे तो ये तक हुआ कि जिनके बाल कड़े होने के कारण शेव करने में कठिनाई हो रही थी उनके बाल कार्यक्रम के इंतज़ाम में शामिल एक दुर्जन के सर - कार्यक्रम के बाद के, ठीकरा फोड़ समारोह की चल-रिपोर्ट पठन से खड़े हो जाते और सट-सट शेव हो जाती . लंबे समय तक कुंठावश कसमें खाईं और खाई बनाई। जिसके बगैर सब कुछ चल सकता था । खैर "समय की प्रतीक्षा करना ज़रूरी था'' किंतु अब ज़रूरी हो गया था कि सब कुछ खुलासा कर दिया जाए सो वो आलेख के इसी किसी भाग में लिख दिया जाएगा । डरता भी हूँ की कहीं कोई बवाल न मच जाए .
किंतु एकतरफा कारर्वाई इस टीकाकरण समारोह के प्रायोजक भी अकबकाए...... अंत में पिछली कसमों पर इस उस का हवाला देकर बदली गयी जिसकी सबको उम्मीद थी
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  • नर्मदा-काधुँआधारस्वरुप:-सब को मालूम किंतु सब के लिए मनोरम नयनाभिराम दृश्य माँ ने हर और यहदृश्य नहीं रखा जहाँ ज़रूरी था वहाँ सरल मंथर भी रहीं माँ नर्मदा। नर्मदा जयंती की शुभकामनाओं के साथ

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खुलासा:-

· यूँ कि मैंने Dr. Vijay Tiwari "Kislay" एवं डूबेजीके आग्रह दिनांक 17-01-09 के कारण मीट की सहमति दी साथ ही भावातिरेक एवं ब्लागर्स मीट के लिए उत्साहित होकर आयोजन को सफल बनाने के लिए माहौल भी बनाया . समीर भाई की व्यस्तताओं के मद्दे नज़र ज़रूरी था कि उनके पिछले प्रवास पर संकल्पित मीट जैसा हश्र न हो । समय पर मैं पहुंचा किंतु कुछ मित्र अपनी वैयक्तिक परिस्थितियों के कारण न आ सके......! उनमें पंकज स्वामी,माधव सिंह यादव , डाक्टर विजय तिवारी आदि थे यह बात कोई अप्रत्याशित नहीं कोई भी व्यक्ति समय और सामयिक परिस्थिति के हाथों मजबूर हो सकता है । जो मित्र नहीं आए वे गैर जिम्मेदार नहीं थे उनकी परिस्थितियाँ थीं जो वे न आ सके. रहा आयोजन का सवाल बेहद उपयोगी था । रिपोर्ट न दे सका सरकारी व्यस्तताएं थीं . 10 से 5 बजे तक का काम नहीं है रात बिरात यदि कोई काम सौंपा जाता है निबाहना मेरा फ़र्ज़ है. जबलपुर के एक ब्लॉगर मित्र ने आयोजन की रिपोर्ट तैयार की और पोस्ट कर दी जो मीट की सफलता ही है भाई संजीव तिवारी उनकी यह तीसरी पोस्ट थी यानि मीट का असर अच्छा रहा . उधर बिटिया शैली एवं डूबे जी , सब उत्साहित रहे . एक मित्र डाक्टर प्रशांत कौरव ब्लागिंग का पाठ्यक्रम तैयार कराने का अनुरोध कर गए ताकि ब्लागिंग के लिए क्रेश कोर्स न्यूनतम दरों पर उनके कालेज जबलपुर-कालेज ऑफ़ मीडिया एंड जर्नलिज्म में चलाएं जा सकें . वे नि:शुल्क सेमीनार का भी आयोंजन करना चाहतें हैं ताकि हिन्दी-ब्लागिंग को बढावा मिले . मीट में यह भी तय हुआ कि हर ब्लॉगर कम-से-कम एक ब्लॉगर तैयार करे.
अब बताएं इसमें क्या किसी का सम्मान कम होता है सार्वजनिक कार्य करना न करना सबका अपना मामला है ।

·

  • सार्वजनिक संकल्पों में कोई आए तो अच्छा न आए तो अच्छा । सभी अपना अपना व्यक्तित्व, क्षमता, दक्षता साथ लेकर चलते हैं । कोई अपनी रजाई में बैठ कर जाड़ों से बचता है तो कोई ठण्ड से बचने जोगिंग करता है। मेहनत करता है।
  • ग़लत दौनों नहीं तो भाई ग़लत कौन है...? - ग़लत हैं कुंठाएं,क्रोध,मतिभ्रम,.......
  • न तो मैं कोई संकल्प ले रहा हूँ न ही कोई कसम खा रहा हूँ कि मैं किसी समारोह में न जाउंगा जहाँ वे जातें हों जिनसे मैं असहमत हूँ ..... सच तो यह है कि मेरा शत्रु कष्ट में भी बुलाएगा तो ज़रूर जाउंगा । कोई (शत्रु-मित्र) कष्ट में होगा मुझे उसकी मदद करना ही होगा ।
  • मित्रो मुझे स्वीकारिए या नकारिये सुबह से शाम तक मुझे मेरे सभी काम पूरे करने हैं सो करूंगा सही बात सही वक्त पर करूंगा इसमें कोई गफलत होगी तो मैं जिम्मेदार हूँ कोई और नहीं ........ क्या हिन्दी ब्लॉगर की संख्या बढ़ने से किसी एक को लाभ होना है……….?

शायद राहत इन्दौरी साहब का ही शेर है:
"ता उम्र जो अपना चेहरा पढ़ सका
अब हम उसके हाथों आइना नहीं देंगे "

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